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तिरा वजूद तिरी शख़्सियत कहानी क्या
किसी के काम न आए तो ज़िंदगानी क्या
किसी के काम न आए तो ज़िंदगानी क्या
हवस है जिस्म की आँखों से प्यार ग़ाएब है
बदल गए हैं सभी इश्क़ के मआ'नी क्या
अज़ल से जारी है ता हश्र ही चलेगा सफ़र
समय के सामने दरियाओं की रवानी क्या
ये मानता हूँ मैं मेहमाँ ख़ुदा की रहमत है
के तुम ने देखी नहीं मेरी मेज़बानी क्या
ख़ुमार-ए-इश्क़ भी उतरेगा रोज़-ए-वस्ल के बा'द
रहेगी अपनी भला उम्र भर जवानी क्या
बिना लड़े ही जो तू मुश्किलों से हारा है
रगों में तेरी लहू बन गया है पानी क्या
ख़ुशी की चाह में कुछ ग़म उठाने पड़ते हैं
गुलों की ख़ार नहीं करते पासबानी क्या
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हुनर नहीं जो हवाओं के पर कतरने का
रहेगा ख़ौफ़ हमेशा ही बुझ के मरने का
रहेगा ख़ौफ़ हमेशा ही बुझ के मरने का
हम आइनों के मुख़ातब न हो सकेंगे कभी
हमें तो ख़तरा है अपना नक़ाब उतरने का
वफ़ा की राह पे मरना भी था मुझे मंज़ूर
कोई तो होगा सबब मेरे अब मुकरने का
दराड़ बढ़ती है बढ़ जाए बद-गुमानी की
इरादा मेरा भी उन से न बात करने का
बहेलिए की कहानी से ही डरे ताइर
रहा न हौसला उन में उड़ान भरने का
न उस ने दिल से मुझे रोकने की कोशिश की
न मेरे पास समय था वहाँ ठहरने का
सफ़ेद होने लगीं हैं हमारी भी क़ल
में
निशान पड़ने लगा वक़्त के गुज़रने का
फ़लक से राह-नुमाई 'दिनेश' ने की थी
सवाल उठता कहाँ ज़ुल्मतों से डरने का
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मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता
तो कामयाबी का पर्वत भी सर नहीं करता
तो कामयाबी का पर्वत भी सर नहीं करता
हसीन ख़्वाब अगर दिल में घर नहीं करता
तवील रात से मैं दर-गुज़र नहीं करता
सिखा दिया है मुझे ग़म ने ज़िंदगी का हुनर
किसी भी हाल में अब आँख तर नहीं करता
गिरे ज़मीन पे दस्तार सर के झुकने से
मैं हुक्मराँ को सलाम इस क़दर नहीं करता
मैं अपने अज़्म की पतवार साथ रखता हूँ
मिरे सफ़ीने पे तूफ़ाँ असर नहीं करता
ग़ुरूर साथ में चलता है हर घड़ी उस के
वो अब अमीर है तन्हा सफ़र नहीं करता
दिया उमीद का तू हर घड़ी जलाए रख
हर एक रात की क्या रब सहर नहीं करता
अजब जवाब था उन का 'दिनेश' सोचेंगे
सुना था इश्क़ कोई सोच कर नहीं करता
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बचपन था वो हमारा या झोंका बहार का
लौट आए काश फिर वो ज़माना बहार का
लौट आए काश फिर वो ज़माना बहार का
खिड़की में इक गुलाब महकता था सामने
बरसों से बंद है वो दरीचा बहार का
कलियों का हुस्न गुल की महक तितलियों का रक़्स
है याद मुझ को आज भी चेहरा बहार का
अर्सा गुज़र गया प लगे कल की बात हो
उस बाग़-ए-हुस्न में मिरा दर्जा बहार का
दौर-ए-ख़िज़ाँ में दिल के बहलने का है सबब
आँखों में मेरी क़ैद नज़ारा बहार का
कलियाँ को बाग़बाँ ही मसलता है जब कभी
रोता है ज़ार ज़ार कलेजा बहार का
मर्ज़ी पे गुल्सिताँ की भला कब है मुनहसिर
आना बहार का या न आना बहार का
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रफ़्ता रफ़्ता तर्जुमानी दर्द की
शाइ'री है क़द्रदानी दर्द की
शाइ'री है क़द्रदानी दर्द की
ज़ख़्म-ए-दिल का मर्तबा शाहों सा है
और दिल है राजधानी दर्द की
हम से पूछो तुम मज़ा तकलीफ़ का
हम ने की है मेज़बानी दर्द की
मुस्कुराहट बा-सबब होंठों पे है
ख़ुश-नुमा रुख़ है निशानी दर्द की
ज़िंदगी में सब भले ग़मगीन हैं
है अलग सब की कहानी दर्द की
ग़मगुसारों से किनारा कर लिया
दिल ने आख़िर बात मानी दर्द की
मर गए होते 'दिनेश' उस के बग़ैर
जी रहे हैं मेहरबानी दर्द की
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