Dilshad Naseem

Top 10 of Dilshad Naseem

    ज़माने को उल्फ़त का दस्तूर कर दूँ
    मैं तेरी कहानी को मशहूर कर दूँ

    तिरे सामने रो लूँ जी चाहता है
    तिरे दिल को भी ग़म से मैं चूर कर दूँ

    मसीहा का एहसाँ नहीं चाहती हूँ
    मैं ज़ख़्मों को अपने ही अंगूर कर दूँ

    मिरे इश्क़ पर कोई तोहमत न धरना
    अगर तुम कहो ख़ुद को मंसूर कर दूँ

    अगर मिल सके मुझ को अश्कों के बदले
    ग़म-ए-इश्क़ से ख़ुद को मा'मूर कर दूँ

    अगर आँख भर के वो देखे मुझे तो
    मैं दिल उस की ख़िदमत पे मामूर कर दूँ

    गिरा दूँ मैं नफ़रत की दीवारें सारी
    मोहब्बत को दुनिया का मंशूर कर दूँ
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    आँखों आँखों में गुज़ारी शब-ए-हिज्राँ हम ने
    अश्क रहने दिए हर शब पस-ए-मिज़्गाँ हम ने

    ज़िंदगी तुझ से इबारत है सो तेरी ख़ातिर
    ज़ीस्त की रह में बिछाईं सदा कलियाँ हम ने

    साँस की लय पे धड़कता है तुम्हें देख के दिल
    दिल को देखा है कई बार ही रक़्साँ हम ने

    मुंदमिल ज़ख़्म हुए थे न हमारे दिल के
    फिर नए ग़म को किया आज ही मेहमाँ हम ने

    ख़्वाब आँखों में कोई कैसे उतर कर आता
    नींद का जबकि लिया ही नहीं एहसाँ हम ने

    रात रोए थे बहुत कोई बहाना न बना
    रात फिर उठता हुआ देखा है तूफ़ाँ हम ने

    बिन बुलाए ही चली आई शब-ए-ग़म देखो
    देखा 'दिलशाद' को फिर आज परेशाँ हम ने
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    तेरी उल्फ़त वसूल हो जैसे
    ने'मतों का नुज़ूल हो जैसे

    तू मिरे आसमाँ का तारा है
    दिल तिरी रह की धूल हो जैसे

    तेरे ताबे' ही चलने लगता है
    वक़्त तेरा उसूल हो जैसे

    तेरा दीदार हो रहा है मुझे
    मेरी मन्नत क़ुबूल हो जैसे

    हसरतों से उलझती रहती हूँ
    ज़िंदगानी बबूल हो जैसे

    कपकपी सी बदन में उतरी है
    मेरी हालत मलूल हो जैसे

    इस तहय्युर से तुझ को सुनती हूँ
    सारी दुनिया फ़ुज़ूल हो जैसे
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    इश्क़ का भी क़बील होता है
    दर्द दिल का कफ़ील होता है

    याद आया न कर नमाज़ों में
    मेरा सज्दा तवील होता है

    बे-वफ़ाओं के ज़िक्र में तेरा
    तज़्किरा बर-सबील होता है

    अर्सा-ए-ज़ीस्त तुम ज़रा सोचो
    हाए कितना तवील होता है

    ऐ शब-ए-ग़म हर एक पल तेरा
    मुझ को सदियाँ मसील होता है

    अश्क जो इश्क़ ने बहाएा वो
    आशिक़ों का वकील होता है

    तन्हा बे-चारा सा ये मेरा दिल
    तेरे बिन अब अलील होता है
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    है उदासी का मुर्तकिब कोई
    मुझ में रहता है मुज़्तरिब कोई

    चाँद भी रौशनी नहीं देता
    जब से रूठा है बे-सबब कोई

    अपने मौक़िफ़ की बात करता है
    मुझ से मिलता है आ के जब कोई

    मैं तो सुनती नहीं हूँ अपनी भी
    यहाँ होता है अपना कब कोई

    कीजिए ग़म से आप ही पर्दा
    कह रहा है ये मुहतजिब कोई
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    तुम्हारे वस्ल को वा'दों में रख दिया मैं ने
    कि जैसे फूल किताबों में रख दिया मैं ने

    चराग़ पहले मुंडेरों पे मैं ने रक्खे हैं
    फिर इंतिज़ार चराग़ों में रख दिया मैं ने

    ख़ुद अपने इश्क़ की शिद्दत को आज़माया है
    दिया जला के हवाओं में रख दिया मैं ने

    किसी का अक्स न आएगा आइने में मिरे
    तुम्हारे रूप को आँखों में रख दिया मैं ने
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    लगेगा न दिल तेरा तन्हा मिरी जाँ
    नहीं तुम ने लेकिन ये समझा मिरी जाँ

    ये आईना हैरत से तकता है मुझ को
    न जाने किया इस पे बीता मिरी जाँ

    ये दिल तो है क्या चीज़ जाँ तुझ को देती
    अगर तू कभी मुझ से कहता मिरी जाँ

    कि हम तुम मिलेंगे किसी भी जनम में
    कभी तुम ने भी सोचा ऐसा मिरी जाँ

    वो सपना था या फिर मिरे पास थे तुम
    कोई तुम सा मुझ में था महका मिरी जाँ

    मिरा इश्क़ दरिया को तय कैसे करता
    घड़ा भी था बिल्कुल ही कच्चा मिरी जाँ

    तू बन के मुक़द्दर का तारा था चमका
    अभी कल ही शब मैं ने देखा मिरी जाँ
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    न जाने कैसी मोहब्बत के वा'दे रात जले
    जला जो ख़त तो सखी मेरे दोनों हाथ जले

    गुज़ारा दिन जो उदासी में शाम कहने लगी
    बहुत अकेली हूँ मैं कोई मेरे साथ जले

    पलट के हाल न पूछा फ़रेब-कारों ने
    ये दिल के साथ मिरे एक और घात जले

    गँवा के बैठी हूँ मैं आज अपना सब्र-ओ-क़रार
    कि साथ चाँद के मेरी तू सारी रात जले

    मैं उस कहानी का किरदार हूँ कि जिस में सदा
    वफ़ा को लिखने से पहले ही मेरा हाथ जले

    ख़िज़ाँ के बा'द बहारों की राह देखी तो
    ये हैफ़ सद कि मिरी आरज़ू के पात जले

    है प्यास ऐसी कि 'दिलशाद' आँसू तक हैं पिए
    कि तेरे हिज्र में दिल मेरा बात बात जले
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    वो तेरा मुझ से कहा हर्फ़ हर्फ़ सच निकला
    भला मैं कौन तिरा हर्फ़ हर्फ़ सच निकला

    कहा था उस ने मोहब्बत फ़रेब है दिल का
    वो जब भी दूर गया हर्फ़ हर्फ़ सच निकला

    अना-परस्ती में अपनी मिसाल आप था वो
    जो उस ने चाहा किया हर्फ़ हर्फ़ सच निकला

    नहीं है कोई शिकायत मुझे ज़माने से
    मुझे था जो भी गिला हर्फ़ हर्फ़ सच निकला

    लिखी थी उस ने मोहब्बत की बे-क़रारी और
    वो जो भी लिख न सका हर्फ़ हर्फ़ सच निकला

    नहीं हो तुम तो अज़िय्यत है कारोबार-ए-हयात
    ये झूट तेरा पिया हर्फ़ हर्फ़ सच निकला
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