दिल खो गया हमारा किसी से मिला के हाथ
हो दस्तरस तो काटिए दुज़्द-ए-हिना के हाथ
हो दस्तरस तो काटिए दुज़्द-ए-हिना के हाथ
इक तस्मा रह गया है रग-ए-जाँ का लगा हुआ
झूटा पड़ा है आह कहाँ उन का जा के हाथ
हाथों पे हम को नाग खिलाने की मश्क़ है
छूते हैं हम जभी तिरे गेसू बढ़ा के हाथ
फैला ले पाँव खोल के दिल ऐ शब-ए-फ़िराक़
बैठे हैं हम भी ज़ीस्त से अपनी उठा के हाथ
क्यूँ हाथ-पाँव मेरे ख़ुशी से न भूल जाएँ
उँगली चुभूवे हाथ में जब वो मिला के हाथ
वो आड़े हाथों लूँ कि अकड़ सारी भूल जाए
मुँह की न खाना शैख़-जी हम से मिला के हाथ
सरसों जमानी हाथों पे यूँ सीख ले कोई
दिल से मिला लिया है दिल उन से मिला के हाथ
ये बेकसी के हाथों हुआ है हमारा हाल
पैग़ाम भेजते हैं हम उन को सबा के हाथ
'कैफ़ी' न नाज़ुकी पे तुम इस बुत की भूलना
देखे नहीं अभी किसी नाज़ुक-अदा के हाथ
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यूँ सिसकता मुझे तुम छोड़ न जाओ आओ
आख़िरी वक़्त है ऐ जान-ए-मन आओ आओ
आख़िरी वक़्त है ऐ जान-ए-मन आओ आओ
सोहबत-ए-लुत्फ़ में लो नाम न ग़ैरों का कभी
दिल में आशिक़ के न तुम आग लगाओ आओ
बे-बने ही बहुतों को है बिगाड़ा इस ने
अपनी काकुल को बहुत अब न बनाओ आओ
पी भी लो रहने दो कौसर की कहानी ज़ाहिद
ऐसी बे-पर की न यारों से उड़ाओ आओ
'कैफ़ी' छोड़ो भी कहीं कू-ए-बुताँ की ये धुन
चैन आराम दिल-ओ-दीं न गँवाओ आओ
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सूरत-ए-हाल अब तो वो नक़्श-ए-ख़याली हो गया
जो मक़ाम मा-सिवा था दिल में ख़ाली हो गया
जो मक़ाम मा-सिवा था दिल में ख़ाली हो गया
मुमतन'अ जो था वो है ज़ेब-ए-बदाहत क़ल्ब को
जो यक़ीनी अम्र था वो एहतिमाली हो गया
छोड़ी ख़ुद-बीनी तो अब हर शय में हुस्न आया नज़र
दीदा-ए-हक़-बीं जलाली से जमाली हो गया
ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा ये है आँखों पर अब रखता हूँ मैं
ज़र्रे ज़र्रे को जो नज़्र-ए-पाएमाली हो गया
ज़ोम और पिंदार का हक़-उल-यक़ीं से है बदल
वो घरोंदा अब तो फ़ानूस-ए-ख़याली हो गया
आँख उठ कर हुस्न-ए-क़ुदरत से जो अपने पर गई
सब ख़ुदी का रंग रंग-ए-इंफ़िआली हो गया
पहले इस में सर था ऐ समसाम इश्क़ और जान थी
क्यूँकि मिलता तुझ से आ अब हाथ ख़ाली हो गया
ग़ैरत-ए-दिल-दादा-ओ-दिल-दार की जाती रही
अब तो जो होना था ऐ आक़ा-ए-आली हो गया
वजह-ए-इल्म-ए-ज़ात हो क्यूँकर न इरफ़ान-ए-सिफ़त
क्या अर्ज़ की शान जब जौहरस ख़ाली हो गया
जो रहा ख़ुद्दार होने पर ख़ुदी से दूर दूर
वो दयार-ए-इश्क़ ओ दिल-सोज़ी का वाली हो गया
है ख़ता उस को अगर आशिक़ कहो तुम जिस का इश्क़
ख़त्म जब उस ने मुराद इक अपनी पा ली हो गया
जज़्बा-ए-ईसार क्या क़ुव्वत अमल की फिर कहाँ
जब शुऊर इंसाँ का सर्फ़-ए-ला-उबाली हो गया
ऐ क़दामत-केश सुन ये आलम-ए-ईजाद है
नाम जिद्दत का अज़ल में ला-यज़ाली हो गया
छोड़ कर लुत्फ़-ए-सुख़न मग़्ज़-ए-सुख़न से काम लो
क्या हुआ 'कैफ़ी' जो गर्म-ए-ख़ुश-मक़ाली हो गया
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ख़ुदा भी तरफ़-दार निकला तुम्हारा
ये झगड़ा चुका अब हमारा तुम्हारा
ये झगड़ा चुका अब हमारा तुम्हारा
बुतो शौक़-ए-दीदार से सर न चढ़ना
नज़ारा किसी का तमाशा तुम्हारा
बड़े बा-हया और पर्दा-नशीं हो
है हर कू-ओ-बर्ज़न में चर्चा तुम्हारा
उलू में ही झूटा हूँ पैमाँ-शिकन हूँ
नहीं अब तो कुछ मुझ से शिकवा तुम्हारा
दिल आए न क्यूँ क्यूँ न ईमान जाए
ये सूरत तुम्हारी ये ग़म्ज़ा तुम्हारा
दिल-ओ-जान 'कैफ़ी' है क़ुर्बान तुम पर
नहीं इस से इनकार ज़ेबा तुम्हारा
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क़ैस का तुझ में जुनूँ जज़्बा-ए-मंसूर नहीं
वर्ना मंज़िल-गह-ए-दिलदार तो कुछ दूर नहीं
वर्ना मंज़िल-गह-ए-दिलदार तो कुछ दूर नहीं
कोह-ओ-वादी वही बिजली वही बे-होशी भी
जल्वा लेकिन वो दिल-अफ़रोज़ सर-ए-तूर नहीं
ढूँडने जाऊँ किसे जाऊँ तो मैं जाऊँ कहाँ
दिल के जो पास है वो आँख भी कुछ दूर नहीं
फेर में ज़ात-ओ-सिफ़त के न सरासीमा हो
नहीं मा'लूम कि जौहरस अरज़ दूर नहीं
नज़र आता नहीं तुझ को तो है आँखों का क़ुसूर
अक्स से शख़्स हक़ीक़त में ज़रा दूर नहीं
जल्वा-सामाँ है रह-ए-इश्क़ में ज़र्रा ज़र्रा
साहब-ए-ज़ौक़-ए-नज़र मुंतज़िर-ए-तूर नहीं
अम्र-ए-हक़ हर्फ़-ए-अज़ल है तो ये फ़तवे कैसे
वो नई बात नहीं मैं कोई मंसूर नहीं
झूट सच उस को है यकसाँ वो है अपनी धुन का
हक़-शनासी मिरे नक़्क़ाद का दस्तूर नहीं
किब्र ही से तो अज़ाज़ील है शैतान-ए-रजीम
आदमी है वही इंसान जो मग़रूर नहीं
क्या तमाशा है लिए जाते हैं तक़दीर का नाम
और तदबीर से इक लहजा भी मा'ज़ूर नहीं
नहीं तक़दीर की तहरीर से इनकार मगर
इस में तदबीर मुक़द्दर है जो मज़कूर नहीं
आप तक़दीर सुधर जाएगी तदबीर तो कर
कौन कहता है कि इंसान को मक़्दूर नहीं
तू अवारिज़ से अवारिज़ की है तुझ से परवाज़
तू जो मुतलक़ नहीं मुख़्तार तो मजबूर नहीं
ज़र्रे ज़र्रे को है इक फ़र्ज़ वदीअ'त हक़ से
न समझ तो कोई क़ैसर नहीं फ़ग़्फ़ूर नहीं
कारगाह-ए-अमल इस दहर को वो समझे हैं
गुल-ओ-बुलबुल के करिश्मों से जो मातूर नहीं
कल मैं मिल-जुल के रहे जुज़ का उसी में है वक़ार
फ़र्द नाचीज़ है गर शामिल-ए-जम्हूर नहीं
क्यूँ खिचे रहते हैं ये शैख़-ओ-बरहमन बाहम
दैर का'बास जो हक़ पर हो नज़र दूर नहीं
अदब-ओ-शेर का आलिम है वो वहदत-ए-आईं
कि जहाँ काफ़िर-ओ-दीं-दार का मज़कूर नहीं
हद-ए-जुग़राफ़िया से शे'र की दुनिया है जुदा
दूर कीलास से दो गज़ भी यहाँ तूर नहीं
कैफ़ बाक़ी है वो इस में कि नहीं जिस को ख़ुमार
बादा-ए-शेर कोई बादा-ए-अंगूर नहीं
साक़ी-ए-मस्त-नज़र है ये फ़ुसूँ या ए'जाज़
सब को मदहोश किया आप तो मख़मूर नहीं
साग़र इक और भी दे पीर-ए-मुग़ाँ 'कैफ़ी' को
नश्शा-ए-बे-ख़ूदी-ए-इश्क़ में वो चूर नहीं
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हुस्न-ए-अज़ल का जल्वा हमारी नज़र में है
जो तूर पर हुआ था दिल-ए-दीदा-वर में है
जो तूर पर हुआ था दिल-ए-दीदा-वर में है
दैर ओ हरम में किस लिए आवारा-गर्दियाँ
जिस की तुझे तलाश है वो दिल के घर में है
जो देखने की आँख है तुझ को नहीं मिली
वो नूर क़द में वर्ना शजर में हजर में है
ख़ामोशियों में महफ़िल-ए-अंजुम की उस को देख
हँगामा-मस्त क्यूँ तू नुमूद-ए-सहर में है
देखा है और फिर नहीं आया नज़र तुझे
वो हुस्न वो जलाल जो शम्स ओ क़मर में है
उस को नतीजे इल्लत-ए-ग़ाई की इस को धुन
फ़र्क़ इस क़दर ही बे-ख़बर ओ बा-ख़बर में है
ढूँडा है जिस ने उस ने ही पाया सुना नहीं
लिक्खा हुआ ये हुक्म क़ज़ा-ओ-क़दर में है
हाँ हाँ ख़ुदा ख़ुदा ही है और है बशर बशर
इस उक़्दे का जो हल है वो क़ल्ब-ए-बशर में है
वो भी तो हैं नज़ारा-ए-कुल जुज़ में है जिन्हें
पोशीदा राज़-ए-दीद तो हुस्न-ए-नज़र में है
है इश्क़ जुज़्व-ए-ला-यत-जज़्ज़ा यक़ीन जान
ये क़ीमत-ए-मजाज़-ओ-हक़ीक़त ख़तर में है
क्या शौक़-ए-दीद तुझ पे तो ग़ालिब है लुत्फ़-ए-दीद
जो बात तेरे दिल में है अपनी नज़र में है
निकले न फँस के गेसू-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म से दिल
साहिल पे ख़ाक पहुँचे जो कश्ती भँवर में है
उल्फ़त है किस की कैसी मोहब्बत कहाँ का इश्क़
मादूम तू तो फ़िक्र-ए-दहान-ओ-कमर में है
नाक़िस थी इब्तिदा तो है अंजाम-ए-इश्क़ भी
बे-रब्ती मुब्तदा में जो थी वो ख़बर में है
'कैफ़ी' मसीह-ए-शेर हैं अहबाब और भी
इक तुझ से जान-ए-ताज़ा नहीं इस ढचर में है
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बाइ'से कोई ऐसा है कि मैं कुछ नहीं कहता
वर्ना मुझे सौदा है कि मैं कुछ नहीं कहता
वर्ना मुझे सौदा है कि मैं कुछ नहीं कहता
इल्ज़ाम ये झूटा है कि मैं कुछ नहीं कहता
क्या वो मिरी सुनता है कि मैं कुछ नहीं कहता
झूटा तिरा कहना है कि मैं कुछ नहीं कहता
दा'वा मिरा सच्चा है कि मैं कुछ नहीं कहता
तू देख रहा है जो मिरा हाल है क़ासिद
मुझ को यही कहना है कि मैं कुछ नहीं कहता
कहना जो न था कह गया देखो तो ढिटाई
और फिर कहे जाता है कि मैं कुछ नहीं कहता
वो ज़िद पे तुले बैठे हैं क्या बहस से हासिल
मौक़ा ही ये ऐसा है कि मैं कुछ नहीं कहता
थी समअ'-ख़राशी की शिकायत कभी उन को
अब सुनता हूँ शिकवा है कि मैं कुछ नहीं कहता
बद-गोई सी बद-गोई है बोहतान सा बोहतान
और उस पे वो कहता है कि मैं कुछ नहीं कहता
मैं कुछ कहूँ तो हाथ वो कानों पे हैं धरते
और उल्टा ये छेड़ा है कि मैं कुछ नहीं कहता
आता है जो मुँह पर वो कहे जाते हैं बे-रोक
और उस पे ये फ़िक़रा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मैं देख चुका हूँ उन्हीं कह कह के मगर क्या
उस का ही नतीजा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मैं किस से कहूँ क्या कहूँ सुनता है वहाँ कौन
उस का ही ये मंशा है कि मैं कुछ नहीं कहता
ये तर्क-ए-मोहब्बत नहीं उन से मगर ऐ दोस्त
रंज ऐसा ही पहुँचा है कि मैं कुछ नहीं कहता
क़ैंची सी चली चलती है देखो तो ज़बाँ और
उस पर भी ये दा'वा है कि मैं कुछ नहीं कहता
राज़ उन के खुले जाते हैं एक एक सभों पर
और उस पे तमाशा है कि मैं कुछ नहीं कहता
सच बात के सुनने की उन्हें ताब कहाँ है
इस से यही अच्छा है कि मैं कुछ नहीं कहता
बातें हैं कि छुरियाँ सी चुभी जाती हैं दिल में
मेरा ही कलेजा है कि मैं कुछ नहीं कहता
मैं कहने पे आऊँ तो रुला कर उन्हें छोड़ूँ
मत पूछ सबब क्या है कि मैं कुछ नहीं कहता
चुप-चाप सुनी अन-सुनी कर देता हूँ हर बात
ग़ैरों में भी चर्चा है कि मैं कुछ नहीं कहता
नाज़ुक है मिज़ाज उन का यहाँ सच की है आदत
इस समझे सबब क्या है कि मैं कुछ नहीं कहता
बिगड़ा है मिज़ाज और कहीं तेज़ न हो जाएँ
मुझ को यही साँसा है कि मैं कुछ नहीं कहता
क्यूँ अपनी ज़बाँ से कहूँ पूछो तुम उन्हीं से
राज़ इस में नहीं या है कि मैं कुछ नहीं कहता
जो रंज अज़ीज़ों ने दिए क्या कहूँ 'कैफ़ी'
ग़ैरत का तक़ाज़ा है कि मैं कुछ नहीं कहता
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