उस दर्द से भी तुझ से जो मंसूब रहा है
हर चीज़ से हर शख़्स से मन ऊब रहा है
हर चीज़ से हर शख़्स से मन ऊब रहा है
क्या जानिए कल सुब्ह उभरता है किधर से
इक दिल जो सर-ए-शाम कहीं डूब रहा है
अब होश में आया हूँ तो अच्छा है ये उस्लूब
मय पी के बहकना भी मगर ख़ूब रहा है
हैराँ हूँ उसे कैसे न पहचान सका मैं
वो शख़्स जो बरसों मिरा मतलूब रहा है
ज़ाहिर है तिरे तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ की अदास
इक वक़्त में तू कितनों का महबूब रहा है
चढ़ते हुए सूरज को सलाम उस का भी कह दो
जो शख़्स सर-ए-वादी-ए-शब डूब रहा है
मुनकिर है नए दौर का हर फ़र्द ही उस से
सदियों से ज़माने का जो उस्लूब रहा है
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यादों में तेरी अश्क बहाए को दिन हुए
याद आ कि अब ये लुत्फ़ उठाए को दिन हुए
याद आ कि अब ये लुत्फ़ उठाए को दिन हुए
मुद्दत हुई तू मिलने न आया कभी मुझे
मुझ को भी तेरी याद सताए को दिन हुए
हर सुब्ह फ़िक्र-ए-कार-ए-जहाँ में खुली है आँख
ख़्वाबों में कोई रात बिताए को दिन हुए
हाए वो मय-कदे के सभी दिल-फ़िगार लोग
जिन संग कोई शाम सजाए को दिन हुए
ताज़ा रफ़ाक़तों के नए ज़ख़्म खाइए
पिछली अदावतें जो गँवाए को दिन हुए
आने लगे निगाह में इस वक़्त सब के ऐब
ख़ुद से कभी नज़र जो मिलाए को दिन हुए
महफ़िल की सम्त आना पड़ा आख़िरश हमें
ख़ल्वत-कदे में दिल जो दुखाए को दिन हुए
जब से हुआ हूँ आप में अपने से हम-सुख़न
औरों को अपने शे'र सुनाए को दिन हुए
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तुम्हारी याद से निकली उदासी
मुझे तस्लीम है ऐसी उदासी
मुझे तस्लीम है ऐसी उदासी
मिलन वो आख़िरी भूला न अपना
न उस के बा'द की पहली उदासी
समुंदर से भी गहरा दिल हमारा
हमारे दिल से भी गहरी उदासी
बहुत से पैरहन बदले हैं दिल ने
मगर आख़िर को फिर पहनी उदासी
किसी ने अपने अंदर जज़्ब कर ली
किसी ने चेहरे तक रक्खी उदासी
किसी के लब पे है मुस्कान झूटी
किसी की शक्ल पर फ़र्ज़ी उदासी
कोई हर्फ़-ए-सुख़न तक ले गया है
किसी ने साज़ पर गाई उदासी
किसी तख़्लीक़ में ढल जाए जब तू
हर इक पहलू से है अच्छी उदासी
अभी शोर-ए-तरब थम जाएगा जब
हमारे क़ल्ब से गूँजी उदासी
ज़रा सी देर ख़ुशियों की फ़ज़ाएँ
फिर इस के बा'द इक लंबी उदासी
ख़ुद अपने आप तक सिमटे हुओं की
बड़ी ही दूर तक फैली उदासी
उदास इस बार मैं ये सोच कर हूँ
तिरे होते हुए कैसी उदासी
उदासी ने भी आख़िर तंग आ कर
ये मुझ से कह दिया इतनी उदासी
'अमर' हद्द-ए-नज़र तक देखता हूँ
मैं तुझ में बस उदासी ही उदासी
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चेहरे पर इक चेहरा लगाना सीख लिया
आख़िर हम ने तौर-ए-ज़माना सीख लिया
आख़िर हम ने तौर-ए-ज़माना सीख लिया
कब तक तुझ को ज़हमत हो कतराने की
हम ने भी अब आँख चुराना सीख लिया
हाए तुम तो दिल से मिलने वाले थे
तुम ने कब से हाथ मिलाना सीख लिया
ज़िक्र तो उस का अब भी होता है लेकिन
बात पे हम ने बात बनाना सीख लिया
देखो लड़की ठीक नहीं कम-उम्री में
ये जो तुम ने आँख लड़ाना सीख लिया
कौन यहाँ पर ऐसा जिस ने वक़्त मिला
हम से बेहतर वक़्त गँवाना सीख लिया
हम भी अब कुछ नर्म तबीअ'त वाले हैं
बच्चों ने भी हाथ उठाना सीख लिया
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नशात-ए-दर्द का दरिया उतरने वाला है
मैं इस से और वो मुझ से उभरने वाला है
मैं इस से और वो मुझ से उभरने वाला है
मैं उस की नर्म निगाही से हो गया मायूस
वो मेरी सादा-दिली से मुकरने वाला है
वो मेरे इश्क़ में दीवाना-वार फिरने लगे
ये मो'जिज़ा तो फ़क़त फ़र्ज़ करने वाला है
मिरे ख़याल की परवाज़ से जो वाक़िफ़ है
वो आश्ना ही मिरे पर कतरने वाला है
अभी अभी मिरे कुछ दोस्त आने वाले हैं
मैं सोचता था हर इक ज़ख़्म भरने वाला है
फ़सील-ए-जिस्म पे कुछ नक़्श छोड़ जाएगा
जो हादिसा मिरे दिल पर गुज़रने वाला है
बस इस ख़याल में बिगड़ा रहा मैं बरसों तक
अब एक दिन में कोई क्या सुधरने वाला है
वो बन के ज़ीस्त मिरे पास आ गया है 'अमर'
ये वक़्त मेरे लिए ऐन मरने वाला है
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हाल-ए-दिल बद से बद-तर हुआ देखिए
आप का काम है देखना देखिए
आप का काम है देखना देखिए
वो जो रक्खा हुआ है जहाँ के लिए
आप ख़ुद भी तो वो आइना देखिए
अक़्ल वालों की इमदाद के वास्ते
जाँ-ब-कफ़ है कोई सर-फिरा देखिए
शहर जल बुझ गया लोग मर कब गए
सुब्ह-ए-नौ कल नया हादिसा देखिए
इस तमाशा-ए-अहल-ए-सियासत को आप
देख सकते हैं बस बारहा देखिए
अपने औसान खोती ज़मीं ही नहीं
आसमाँ को भी मरता हुआ देखिए
एक हालत है दिल की कुछ ऐसी भी जब
ख़ुद को मुमकिन है ख़ुद से जुदा देखिए
जल्वा-फ़रमा है जो अपने अंदर उसे
दम-ब-दम देखिए जा-ब-जा देखिए
एक दूजे से उक्ता गए आदमी
इन से उकताएगा कब ख़ुदा देखिए
शिद्दत-ए-ग़म है मैं भी हूँ प्यासा 'अमर'
आस पास अब कोई मै-कदा देखिए
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इस क़दर भी दिल नहीं टूटा हुआ
कुछ सिमट सकता न हो बिखरा हुआ
कुछ सिमट सकता न हो बिखरा हुआ
कब तलक ख़ुद को यही कहता रहूँ
दिल पे मत ले जो हुआ अच्छा हुआ
कौन से मंज़र पे ठहरे आँख भी
सब नज़र आता है बस देखा हुआ
हम यक़ीं कर के उसे पढ़ते रहे
जो भी था हर्फ़-ए-गुमाँ लिक्खा हुआ
सब मरासिम रख गया दहलीज़ पर
दिल गिरफ़्तार-ए-अना होता हुआ
जाने किस ग़म को रिहाई दे रहे
आँख में जो अश्क है आया हुआ
वक़्त कितने ज़ोर से हँसने लगा इश्क़ जब शर्तों पे आमादा हुआ
हाए तर्क-ए-इश्क़ पर उस का ये तंज़
देर ही से हाँ मगर अच्छा हुआ
अब उसे ये भी नहीं है याद तक
है वो किस किस को कहाँ भूला हुआ
वो जिसे कुछ भी न होता था उसे
बा'द तेरे पूछ मत क्या क्या हुआ
चल 'अमर' उस शख़्स को जा कर मिलें
वो नहीं मिलता अगर तो क्या हुआ
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अब गुमाँ है न यक़ीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं
आसमाँ कुछ भी नहीं और ज़मीं कुछ भी नहीं
आसमाँ कुछ भी नहीं और ज़मीं कुछ भी नहीं
मिट गया दिल से अक़ीदत का भरम या'नी अब
उस का दर कुछ भी नहीं अपनी जबीं कुछ भी नहीं
क्यूँ न यक-रंगी-ए-हालात से जी उकताए
अब कोई बज़्म-ए-तरब दौर-ए-हज़ीं कुछ भी नहीं
अब तो हर हुस्न-ओ-नज़र रंग-ओ-महक साज़-ओ-सुख़न
लाख अच्छे हों मगर ख़ुद से हसीं कुछ भी नहीं
जाने किस तौर है तक़्सीम-ए-करम अल्लाह का
है कहीं कितना ही कुछ और कहीं कुछ भी नहीं
आस बँधती है ज़रा देर उसे तकने में
कौन कहता है सर-ए-अर्श-ए-बरीं कुछ भी नहीं
आ ही जाएँगे तह-ए-दाम-ए-अजल सब इक दिन
हो भले तख़्त-नशीं ख़ाक-नशीं कुछ भी नहीं
कितना पुर-शोर था अन्फ़ास का बहता दरिया
क्यूँ ये कहता है दम-ए-बाज़-पसीं कुछ भी नहीं
मिट गया जिस्म हुई रूह भी रुख़्सत कब की
अब यहाँ कोई मकाँ है न मकीं कुछ भी नहीं
ख़ुद से किस तौर सहे शख़्स वो दूरी अपनी
है ब-जुज़ अपने 'अमर' जिस के क़रीं कुछ भी नहीं
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जिस्म है थका हुआ हौसला निढाल है
और सब से पेशतर दिल बहुत उदास है
शहर-ए-मुम्किनात में हो के न उम्मीद मैं
फिर रहा हूँ दर-ब-दर दिल बहुत उदास है
फिर हँसी को देख कर सब फ़रेब खा गए
है भला किसे ख़बर दिल बहुत उदास है
फिर वो क़ुर्ब-ए-यार हो या हँसी की महफ़िलें
कुछ नहीं मज़ा अगर दिल बहुत उदास है
किस अदम की और है इस वजूद का सफ़र
आज ख़ुद को सोच कर दिल बहुत उदास है
अब तिरे सवाल का क्या जवाब दूँ भला
बात ये है मुख़्तसर दिल बहुत उदास है
यूँ भी तेरे दर्द का बस यही इलाज है
मय-कदे में चल 'अमर' दिल बहुत उदास है
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