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गर्दिश-ए-जाम नहीं गर्दिश-ए-अय्याम तो है
सई-ए-नाकाम सही फिर भी कोई काम तो है
सई-ए-नाकाम सही फिर भी कोई काम तो है
दिल की बे-ताबी का आख़िर कहीं अंजाम तो है
मेरी क़िस्मत में नहीं दहर में आराम तो है
माइल-ए-लुत्फ़-ओ-करम हुस्न-ए-दिल-आराम तो है
मेरी ख़ातिर न सही कोई सर-ए-बाम तो है
तू नहीं मेरा मसीहा मिरा क़ातिल ही सही
मुझ से वाबस्ता किसी तौर तिरा नाम तो है
हल्क़ा-ए-मौज में इक और सफ़ीना आया
साहिल-ए-बहर पे कोहराम का हंगाम तो है
तंग-दस्तो तही-दामानो करो शुक्र-ए-ख़ुदा
मय-ए-गुलफ़ाम नहीं है शफ़क़-ए-शाम तो है
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कभी हयात का ग़म है कभी तिरा ग़म है
हर एक रंग में नाकामियों का मातम है
हर एक रंग में नाकामियों का मातम है
ख़याल था तिरे पहलू में कुछ सुकूँ होगा
मगर यहाँ भी वही इज़्तिराब पैहम है
मिरे हबीब मिरी मुस्कुराहटों पे न जा
ख़ुदा-गवाह मुझे आज भी तिरा ग़म है
सहरस रिश्ता-ए-उम्मीद बाँधने वाले
चराग़-ए-ज़ीस्त की लौ शाम ही से मद्धम है
ये किस मक़ाम पे ले आई ज़िंदगी 'राही'
क़दम क़दम पे जहाँ बेबसी का आलम है
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कोई हसरत भी नहीं कोई तमन्ना भी नहीं
दिल वो आँसू जो किसी आँख से छलका भी नहीं
दिल वो आँसू जो किसी आँख से छलका भी नहीं
रूठ कर बैठ गई हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
राह में अब कोई जलता हुआ सहरा भी नहीं
आगे कुछ लोग हमें देख के हँस देते थे
अब ये आलम है कोई देखने वाला भी नहीं
दर्द वो आग कि बुझती नहीं जलती भी नहीं
याद वो ज़ख़्म कि भरता नहीं रिसता भी नहीं
बादबाँ खोल के बैठे हैं सफ़ीनों वाले
पार उतरने के लिए हल्का सा झोंका भी नहीं
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दिन को रहते झील पर दरिया किनारे रात को
याद रखना चाँद तारो इस हमारी बात को
याद रखना चाँद तारो इस हमारी बात को
अब कहाँ वो महफ़िलें हैं अब कहाँ वो हम-नशीं
अब कहाँ से लाएँ उन गुज़रे हुए लम्हात को
पड़ चुकी हैं उतनी गिर्हें कुछ समझ आता नहीं
कैसे सुलझाएँ भला उलझे हुए हालात को
कितनी तूफ़ानी थीं रातें जिन में दो दीवाने दिल
थपकियाँ देते रहे भड़के हुए जज़्बात को
दर्द में डूबी हुई लय बन गई है ज़िंदगी
भूल जाते काश हम उल्फ़त-भरे नग़्मात को
वो कि अपने प्यार की थी भीगी भीगी इब्तिदा
याद कर के रो दिया दिल आज उस बरसात को
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