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दस्तूर था जो ग़म का पुराना बदल गया
सँभले न थे अभी कि ज़माना बदल गया
सँभले न थे अभी कि ज़माना बदल गया
शिकवा नहीं कि साग़र-ओ-मीना बदल गए
टूटा ख़ुमार कैफ़-ए-शबाना बदल गया
जो बाब थे अहम अभी होने थे वो रक़म
पर क्या कि लिखते लिखते फ़साना बदल गया
मश्क़-ए-सुख़न वही है मशक़्क़त भी है वही
कैसे करूँ यक़ीन ज़माना बदल गया
नग़्मा-सरा हैं हम तो उसी सुर में लय में हैं
पर लोग कह रहे हैं तराना बदल गया
क़ाएम पुराने हीलों बहानों पे आज भी
समझे थे इस का तर्ज़ बहाना बदल गया
मेरी थी क्या मजाल हक़ीक़त बदल सकूँ
ख़ाके तह-ए-ख़याल बनाना बदल गया
'आदिल' तुझे यक़ीं नहीं आया न आएगा
तेरा वो यार-ए-ग़ार पुराना बदल गया
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हम से तो राह-ओ-रस्म है अग़्यार की तरह
दुनिया पे मेहरबान हैं ग़म-ख़्वार की तरह
दुनिया पे मेहरबान हैं ग़म-ख़्वार की तरह
कम-माएगी न पूछ मिरी बज़्म-ए-ग़ैर में
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह
मैं ताजिरान-ए-इश्क़ के बारे में क्या कहूँ
इन का जुनूँ है गर्मी-ए-बाज़ार की तरह
ख़ुद-साख़्ता बुतों को मैं अब तोड़-ताड़ कर
पूजूँगा बस उसी को परस्तार की तरह
ज़ौक़-ए-नज़र को आप समझते हैं गर गुनाह
नादिम खड़ा हूँ मैं भी गुनहगार की तरह
देखी है मैं ने शाख़ से पत्तों की रुख़्सती
जाने न दूँगा अब तुझे हर बार की तरह
ज़ाद-ए-सफ़र की फ़िक्र न मंज़िल का हो ख़याल
राह-ए-तलब में आओ तलबगार की तरह
चाहा है तुम को यूँ कि तुम्हें भी ख़बर न हो
सोचा है तुम को अन-कहे अश'आर की तरह
कहने को कोई बंद-ओ-सलासिल नहीं मगर
सब हैं फ़सील-ए-जाँ में गिरफ़्तार की तरह
'आदिल' रुख़-ए-निगार नहीं दिल का आइना
इक़रार-ए-ख़ास होता है इनकार की तरह
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उन के क़िस्से अगर बयाँ होते
राज़ सारे तभी अयाँ होते
राज़ सारे तभी अयाँ होते
तुम को आते हुनर जो रहज़न के
बस तुम्हीं मीर-ए-कारवाँ होते
बैर हम से सही मगर सोचो
हम न होते तो तुम कहाँ होते
ज़िंदगी वो जगह दिखा दे अब
तुझ को पाते तो हम जहाँ होते
उन की महफ़िल में दिल नहीं लगता
जब वो औरों में शादमाँ होते
ये मुकम्मल अगर जहाँ होता
फिर ख़लाओं में क्यूँ जहाँ होते
सोच में क़ुर्बतें अगर होतीं
फ़ासले यूँ न दरमियाँ होते
तुम ही गोशा-नशीन थे 'आदिल'
वर्ना चर्चे कहाँ कहाँ होते
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