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जश्न था ऐश-ओ-तरब की इंतिहा थी मैं न था
यार के पहलू में ख़ाली मेरी जा थी मैं न था
यार के पहलू में ख़ाली मेरी जा थी मैं न था
उस ने कब बरख़ास्त ऐ दिल महफ़िल-ए-मेराज की
किस से पूछूँ रात कम थी या सवा थी में न था
मैं तड़प कर मर गया देखा न उस ने झाँक कर
उस सितमगर को अज़ीज़ अपनी हया थी मैं न था
वा'दा ले लेता कि खिलवाना न मुझ को ठोकरें
आलम-ए-अर्वाह में जिस जा क़ज़ा थी मैं न था
सर्फ़ करता किस ख़ुशी से जा के उस में अपनी ख़ाक
क्या कहूँ जिस दिन बनाई कर्बला थी मैं न था
मुँह न खुल सकता न होते हम-कलाम उन से कलीम
उम्र भर हसरत ही रहती बात क्या थी मैं न था
ले गई थी मुझ को हसरत जानिब-ए-ख़ुद-रफ़्तगी
जिस तरफ़ को मंज़िल-ए-बीम-ओ-रजा थी मैं न था
दिल उलट जाता मिरा या दम निकल जाता मिरा
शुक्र है जब लन-तरानी की सदा थी मैं न था
लाला-ओ-गुल को बचा लेता ख़िज़ाँ से ऐ 'शरफ़'
बाग़ में जिस वक़्त नाज़िल ये बला थी मैं न था
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हुए ऐसे ब-दिल तिरे शेफ़्ता हम दिल-ओ-जाँ को हमेशा निसार किया
रह-ए-इश्क़ से फिर न हटाए क़दम रहे महव तिरे तुझे प्यार किया
रह-ए-इश्क़ से फिर न हटाए क़दम रहे महव तिरे तुझे प्यार किया
तिरे शौक़ में दिल की तबाही हुई तिरे ज़ौक़ की उस पे गवाही हुई
कोई दम भी न लेने दिया मुझे दम मुझे दुश्मन-ए-सब्र-ओ-क़रार किया
गई जाँ क़फ़स में बरा-ए-चमन चली ले के जहाँ से हवा-ए-चमन
कभी अब्र-ए-करम ने किया न करम न किसी ने बयान-ए-बहार किया
जहाँ महके महक गया सारा जहाँ भला इत्र को बू ये नसीब कहाँ
ब-ख़ुदा ही ख़ता कहें मुश्क-बू हम तिरी ज़ुल्फ़ पे सदक़े निसार किया
न लो इश्क़ का नाम ये कहते हो क्या जो हो तेग़-तले भी हमारा गला
यही हम कहे जाएँ ख़ुदा की क़सम तुम्हें प्यार किया तुम्हें प्यार किया
तिरे हाथ से मैं जो शहीद हुआ मिरी रूह का इश्क़ मुरीद हुआ
जो हयात रहा तो न छोड़े क़दम जो मरा तो तवाफ़-ए-मज़ार किया
तिरे शौक़ ने हम को जो ख़ाक किया तिरे ज़ौक़ ने ख़ाक से पाक किया
तिरे रंग ने मुझ पे किया ये करम मुझे तेरे चमन का ग़ुबार किया
तिरे तीर-ए-हदफ़ की हवस थी मुझे बड़ी हसरत-ए-कुंज-ए-नफ़स थी मुझे
मुझे चूक किया ये ग़ज़ब ये सितम न असीर किया न शिकार किया
तुझे चाहा तो रंग ये मिट के जमें तिरे बाग़ में ख़ाक से पाक हुए
मरे तेरे चमन की हवस में जो हम तो ग़ुबार को अब्र-ए-बहार किया
न अदम की जो मुझ को सवारी मिली कोई तख़्त-ए-रवाँ न अमारी मिली
कई दोस्तों ने मिरे हो के बहम मुझे दोश पर अपनी सवार किया
हमें इस की कहीं से ख़बर न मिली हुई उम्र तमाम मगर न मिली
कभी उस ने भी हाल किया न रक़म ख़त-ए-शौक़ रवाना हज़ार किया
तिरे रोज़-ए-अज़ल से फ़रेफ़्ता हैं तिरे हुस्न-ओ-जमाल के शेफ़्ता हैं
तिरे इश्क़ में हो गए कुश्ता-ए-ग़म वही कर गए क़ौल जो यार किया
तिरे बस में जो आए तो ख़ाक हुए जो ग़ुबार हुए भी तो ख़ाक हुए
रहे ब'अद-ए-फ़ना भी न चैन से हम हमें गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार किया
कभी सैर-ए-चमन का न शौक़ हुआ किसी बज़्म का हम को न ज़ौक़ हुआ
तिरे कूचे को जान के बाग़-ए-इरम यहीं बुलबुल-ए-जाँ को निसार किया
जिसे चाहा दिल उस पे निसार करें कभी गोद में लें कभी प्यार करें
ये बुराई नसीब की वाए-सितम वो हरीफ़ हुआ जिसे प्यार किया
मुझे यार ने आ के जो देखा हज़ीं कहा रोए हो मैं ने कहा कि नहीं
वो कहे गए आँखों पे क्यूँ है वरम 'शरफ़' उन से बहाना हज़ार किया
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हवस गुलज़ार की मिस्ल-ए-अनादिल हम भी रखते थे
कभी था शौक़-ए-गुल हम को कभी दिल हम भी रखते थे
कभी था शौक़-ए-गुल हम को कभी दिल हम भी रखते थे
क़ज़ा भी तेरे हाथों चाहते थे तुझ को क्या कीजे
नहीं तो तेग़-ए-दम के साथ क़ातिल हम भी रखते थे
ख़ता-ए-इश्क़ पर हम पर न इतना भी सितम ढाओ
अगर चाहा तो चाहा क्या हुआ दिल हम भी रखते थे
ख़ुदा को इल्म है ज़िंदा है या जल-भुन गया शब को
दिल अपना तेरे परवानों में शामिल हम भी रखते थे
मिरी जाँ-बाज़ियों पर गोर में रुस्तम ये कहता है
न थे ऐसे जरी गो शे'र का दिल हम भी रखते थे
इलाक़ा इश्क़ का लेते ये सोचे होंगे बर्बादी
वगर्ना नक़्द-ए-जान ओ सिक्का-ए-दिल हम भी रखते थे
ख़ुदा के सामने होगी जो पुर्सिश इश्क़-बाज़ों की
कहेंगे हम भी इतना इश्क़-ए-कामिल हम भी रखते थे
तमन्ना थी हमें भी तेरी सोहबत देख लेने की
कि परवाने थे शौक़-ओ-ज़ौक़-ए-महफ़िल हम भी रखते थे
बड़े उक़्दा-कुशा थे तुम तो हल इस को भी करना था
मुहिम्म-ए-इश्क़ सर करने की मुश्किल हम भी रखते थे
तलाश-ए-यार में ख़ुफ़िया गए उश्शाक़ दुनिया से
ख़बर भी की न हम को शौक़-ए-मंज़िल हम भी रखते थे
कोई लहजा जुदाई में तड़पने से न फ़ुर्सत थी
कभी पहलू में दिल मानिंद-ए-बिस्मिल हम भी रखते थे
जुनूँ का ज़ोर था दिल में जगह कर ली थी वहशत ने
ग़रज़ पेश-ए-नज़र लैला ओ महमिल हम भी रखते थे
जगह दिल की तरह पहलू में दी होती हमें तुम ने
लियाक़त इस सर-अफ़राज़ी के क़ाबिल हम भी रखते थे
उसे क्यूँकर न कहते हम कि यकता है ख़ुदाई में
शनासा थे तमीज़-ए-हक़्क़-ओ-बातिल हम भी रखते थे
ख़ुदा ने जान छुड़वाई 'शरफ़' वो ख़ुद बिगड़ बैठा
हक़ीक़त में अजब माशूक़-ए-जाहिल हम भी रखते थे
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तिरे वास्ते जान पे खेलेंगे हम ये समाई है दिल में ख़ुदा की क़सम
रह-ए-इश्क़ से अब न हटेंगे क़दम हमें अपने ही सिदक़-ओ-सफ़ा की क़सम
रह-ए-इश्क़ से अब न हटेंगे क़दम हमें अपने ही सिदक़-ओ-सफ़ा की क़सम
मिरे पुर्ज़े अगरचे उड़ाइएगा तो गुल-ए-ज़ख़्म से महकेगी इश्क़ की बू
खिंचे तेग़ तिरी तो रगड़ दूँ गुलू मुझे तेरे ही जौर-ओ-जफ़ा की क़सम
मिरा नाम जो यार है पूछ रहा मैं बता दूँ तुझे जो लक़ब है मिरा
मुझे कहते हैं कुश्त-ए-नाज़-ओ-अदा तिरे ग़म्ज़ा-ए-होश-रुबा की क़सम
लब-ए-गोर अगरचे जुदाई में हूँ मगर आइना-ए-दिल की सफ़ाई में हूँ
तिरा महव ख़ुदा की ख़ुदाई में हूँ मुझे अपने ही इश्क़-ओ-वफ़ा की क़सम
किए तुम ने जो ज़ुल्म वो मैं ने सहे मिरी आँखों से बरसों ही अश्क बहे
कोई ग़म्ज़ा-ओ-इश्वा अब उठ न रहे तुम्हें अपने ही नाज़-ओ-अदा की क़सम
शब-ए-हिज्र में आँख जो बंद हुई तिरी ज़ुल्फ़ की याद दो चंद हुई
मिरी साँस उलझ के कमंद हुई मुझे तेरी ही ज़ुल्फ़-ए-दोता की क़सम
तिरी चाल से हश्र बपा जो किया तिरे ख़ौफ़ से हाल मिरी ये हुआ
हुई जाती थी रूह बदन में फ़ना मुझे आमद-ए-रोज़-ए-जज़ा की क़सम
मिरे हाथों में ख़ून मलो तो ज़रा तुम्हीं देखो तो रंग दिखाता है क्या
करो आज नुमूद-ए-शहीद-ए-अदा तुम्हें शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना की क़सम
कहा लैला ने है मुझे क़ैस का ग़म मिरे दिल को है उस के जुनूँ का अलम
नहीं चैन जुदाई में अब कोई दम उसे वहशी-ए-बे-सर-ओ-पा की क़सम
तिरी बज़्म का मिस्ल ही यार नहीं कि जिनाँ में ये नक़्श-ओ-निगार नहीं
कहीं तेरे चमन से बहार नहीं मुझे बाग़-ए-इरम की फ़ज़ा की क़सम
ग़म-ए-दौलत-ए-वस्ल में हो के हज़ीं रह-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा में हैं ख़ाक-नशीं
हवस अब हमें जाह-ओ-हशम की नहीं हमें तेरे ही नश्व-ओ-नुमा की क़सम
ये दुआ है क़फ़स में बरा-ए-चमन कि गुलों से ख़ुदा न छुड़ाए चमन
मुझे रखती है ज़िंदा हवा-ए-चमन गुल-ओ-ग़ुंचा-ओ-बाद-ए-सबा की क़सम
तिरा शेफ़्ता हूँ मिरी तुझ में है जाँ तह-ए-तेग़ न कर मुझे जान-ए-जहाँ
मिरा ग़ुस्से में आ के मिटा न निशाँ तुझे जाह-ओ-जलाल-ए-ख़ुदा की क़सम
ये हवस है कि दर्द-ए-जिगर में मरूँ जो मसीह भी आए तो दम न भरूँ
कभी तेरे सिवा न इलाज करूँ मुझे तेरे ही दस्त-ए-शिफ़ा की क़सम
शरफ़ उस ने दिए हमें सैकड़ों दम रहे तीनत साफ़ से पाक ही हम
कही बात अगर तो सच ही कही कभी झूट न बोले ख़ुदा की क़सम
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उड़ कर सुराग़-ए-कूचा-ए-दिलबर लगाइए
किस तरह दोनों बाज़ुओं में पर लगाइए
किस तरह दोनों बाज़ुओं में पर लगाइए
इक तीर दिल पर एक जिगर पर लगाइए
हिस्सा लगाइए तो बराबर लगाइए
फूलों में तोपिए मुझे नाज़ुक-दिमाग़ हूँ
लिल्लाह इस लहद में न पत्थर लगाइए
जब बज़्म-ए-यार में है तकल्लुफ़ रसाई का
ख़ल्वत-सरा-ए-ख़ास में बिस्तर लगाइए
हर दम किया करे रग-ए-जाँ मर्हबा का शोर
इस नोक-झोंक से कोई नश्तर लगाइए
बरसों से बे-क़रार है तस्कीन के लिए
झुकिए ज़रा जिगर से मिरे सर लगाइए
क्या बस्तनी क़फ़स की ये बुलबुल को भेजिए
हिस्से में उस के फूलों की चादर लगाइए
जा अपने दिल में दीजिए मुझ साफ़-क़ल्ब को
आईने में शबीह-ए-सिकंदर लगाइए
यावर नसीब हो तो हसीनों को चाहिए
दिल उन से आज़मा के मुक़द्दर लगाइए
अक्सर वो कहते हैं कि जो बोसा तलब करे
इस गुफ़्तुगू पे मुँह इसे क्यूँकर लगाइए
आए दहान-ए-ज़ख़्म से आवाज़ और और
इस इस अदा-ओ-नाज़ से ख़ंजर लगाइए
पुर्ज़े मिरे उड़ाइए भेजा है मैं ने ख़त
बे-जुर्म क्यूँ कबाब-ए-कबूतर लगाइए
सूरत जो एक एक की तकता है आइना
हसरत ये है सुराग़-ए-सिकंदर लगाइए
हैं आप तो तमाम ख़ुदाई के नाख़ुदा
मेरा जहाज़ भी लब-ए-कौसर लगाइए
बरहम-मिज़ाज हो के वो बरगश्तगी करे
दफ़्तर में जिस के फ़र्द-ए-मुक़द्दर लगाइए
दौलत जो मुझ ग़रीब की लूटी है आप ने
क्या कीजिएगा हिस्सा-ए-लश्कर लगाइए
जतनों की जानें लीं हैं उन्हें ख़ूँ-बहा मिले
पूरा हिसाब देख के दफ़्तर लगाइए
उस गुल की आ ही जाएगी ख़ुशबू दिमाग़ में
चलिए रियाज़-ए-इश्क़ में चक्कर लगाइए
इफ़शा किया जो इश्क़ तो झुँझला के बोले वो
लिखवा के इश्तिहार ये घर घर लगाइए
सौ जा से दिल फटा है कलेजा है चाक चाक
पैवंद फाड़ फाड़ के चादर लगाइए
फिर उठ के तेरे हाथ से कटवाइए गला
क्यूँ-कर दोबारा जिस्म में फिर सर लगाइए
साथ इस क़दर हैं उस शह-ए-ख़ूबाँ के सरफ़रोश
बरसों हिसाब कसरत-ए-लश्कर लगाइए
कहते हैं लख़्त-ए-दिल को वो बाज़ार-ए-हुसन में
सौदा ये मेरे उर्दू से बाहर लगाइए
मुझ से लगावट आप की शमशीर करती है
मरता हूँ उस पे इस को मिरे सर लगाइए
सैलाब-ए-अश्क ने मिरे रस्ते किए हैं बंद
कश्ती मँगा के मुत्तसिल-ए-दर लगाइए
ख़िलअत शहीद-ए-नाज़ को भिजवाते हैं जवाब
कश्ती में पहले फूलों की चादर लगाइए
पहुँचा के ख़त हलाल हुआ है ये ऐ 'शरफ़'
आँखों से ले के ख़ून-ए-कबूतर लगाइए
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जब से हुआ है इश्क़ तिरे इस्म-ए-ज़ात का
आँखों में फिर रहा है मुरक़्क़ा नजात का
आँखों में फिर रहा है मुरक़्क़ा नजात का
मालिक ही के सुख़न में तलव्वुन जो पाइए
कहिए यक़ीन लाइए फिर किस की बात का
दफ़्तर हमारी उम्र का देखोगे जब कभी
फ़ौरन उसे करोगे मुरक़्क़ा नजात का
उल्फ़त में मर मिटे हैं तो पूछे ही जाएँगे
इक रोज़ लुत्फ़ उठाएँगे इस वारदात का
सुर्ख़ी की ख़त्त-ए-शौक़ में हाजत जहाँ हुई
ख़ून-ए-जिगर में नोक डुबोया दवात का
मूजिद जो नूर का है वो मेरा चराग़ है
परवाना हूँ मैं अंजुमन-ए-काएनात का
ऐ शम्-ए-बज़्म-ए-यार वो परवाना कौन था
लौ में तिरी ये दाग़ है जिस की वफ़ात का
मुझ से तो लन-तरानियाँ उस ने कभी न कीं
मूसी जवाब दे न सके जिस की बात का
इस बे-ख़ुदी का देंगे ख़ुदा को वो क्या जवाब
दम भरते हैं जो चंद नफ़स के हुबाब का
क़ुदसी हुए मुतीअ वो ताअत बशर ने की
कुल इख़्तियार हक़ ने दिया काएनात का
ऐसा इताब-नामा तो देखा सुना नहीं
आया है किस के वास्ते सूरा बरात का
ज़ी-रूह मुझ को तू ने किया मुश्त-ए-ख़ाक से
बंदा रहूँगा मैं तिरे इस इल्तिफ़ात का
नाचीज़ हूँ मगर मैं हूँ उन का फ़साना-गो
क़ुरआन हम्द-नामा है जिन की सिफ़ात का
रोया है मेरा दीदा-ए-तर किस शहीद को
मशहूर हो गया है जो चश्मा फ़ुरात का
आए तो आए आलम-ए-अर्वाह से वहाँ
दम भर जहाँ नहीं है भरोसा सबात का
धूम उस के हुस्न की है दो-आलम में ऐ 'शरफ़'
ख़ुर्शीद रोज़ का है वो महताब रात का
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चलते हैं गुलशन-ए-फ़िरदौस में घर लेते हैं
तय ये मंज़िल जो ख़ुदा चाहे तो कर लेते हैं
तय ये मंज़िल जो ख़ुदा चाहे तो कर लेते हैं
इश्क़ किस वास्ते करते हैं परी-ज़ादों से
किस लिए जान पर आफ़त ये बशर लेते हैं
देखने भी जो वो जाते हैं किसी घाएल को
इक नमक-दाँ में नमक पीस के भर लेते हैं
ख़ाक उड़ जाती है सुथराव उधर होता है
नीमचा खेंच के वो बाग जिधर लेते हैं
मैं वो बीमार हूँ अल्लाह से जा के ईसा
मिरे नुस्ख़ों के लिए हुक्म-ए-असर लेते हैं
यार ने लूट लिया मुझ वतन-आवारा को
लोग ग़ुर्बत में मुसाफ़िर की ख़बर लेते हैं
इस तरफ़ हैं कि झरोके में उधर बैठे हैं
जाएज़ा कुश्तों का अपने वो किधर लेते हैं
ठीक उस रश्क-ए-चमन को वो क़बा होती है
नाप कर जिस की रग-ए-गुल से कमर लेते हैं
कुछ ठिकाना है परी-ज़ादों की बे-रहमी का इश्क़-बाज़ों से क़िसास आठ पहर लेते हैं
ये नया ज़ुल्म है ग़ुस्सा जो उन्हें आता है
बे-गुनाहों को भी माख़ूज़ वो कर लेते हैं
शोहरत उस सैद-ए-वफ़ादार की उड़ जाती है
तीर में जिस के लगाने को वो पर लेते हैं
कहते हैं हूरों के दिल में तिरे कुश्तों के बनाव
इस लिए ख़ूँ में नहा कर वो निखर लेते हैं
किस क़दर नामा-ओ-पैग़ाम को तरसाया है
भेजते हैं ख़बर अपनी न ख़बर लेते हैं
दम निकलते हैं कलेजों से लहू जारी है
साँस उल्टी तिरे तफ़तीदा-जिगर लेते हैं
चल खड़े होंगे तो हस्ती मैं न फिर ठहरेंगे
जान-ए-जाँ चंद नफ़स दम ये बशर लेते हैं
है इशारा यही मू-हा-ए-मिज़ा का उन की
हम वो नश्तर हैं कि जो ख़ून-ए-जिगर लेते हैं
सामना करते हैं जिस वक़्त गदा का तेरे
बादशह तख़्त-ए-रवाँ पर से उतर लेते हैं
सिक्का-ए-दाग़-ए-जुनूँ पास हैं रहना होश्यार
लोग रस्ते में 'शरफ़' जेब कतर लेते हैं
Read Fullकिस लिए जान पर आफ़त ये बशर लेते हैं
देखने भी जो वो जाते हैं किसी घाएल को
इक नमक-दाँ में नमक पीस के भर लेते हैं
ख़ाक उड़ जाती है सुथराव उधर होता है
नीमचा खेंच के वो बाग जिधर लेते हैं
मैं वो बीमार हूँ अल्लाह से जा के ईसा
मिरे नुस्ख़ों के लिए हुक्म-ए-असर लेते हैं
यार ने लूट लिया मुझ वतन-आवारा को
लोग ग़ुर्बत में मुसाफ़िर की ख़बर लेते हैं
इस तरफ़ हैं कि झरोके में उधर बैठे हैं
जाएज़ा कुश्तों का अपने वो किधर लेते हैं
ठीक उस रश्क-ए-चमन को वो क़बा होती है
नाप कर जिस की रग-ए-गुल से कमर लेते हैं
कुछ ठिकाना है परी-ज़ादों की बे-रहमी का इश्क़-बाज़ों से क़िसास आठ पहर लेते हैं
ये नया ज़ुल्म है ग़ुस्सा जो उन्हें आता है
बे-गुनाहों को भी माख़ूज़ वो कर लेते हैं
शोहरत उस सैद-ए-वफ़ादार की उड़ जाती है
तीर में जिस के लगाने को वो पर लेते हैं
कहते हैं हूरों के दिल में तिरे कुश्तों के बनाव
इस लिए ख़ूँ में नहा कर वो निखर लेते हैं
किस क़दर नामा-ओ-पैग़ाम को तरसाया है
भेजते हैं ख़बर अपनी न ख़बर लेते हैं
दम निकलते हैं कलेजों से लहू जारी है
साँस उल्टी तिरे तफ़तीदा-जिगर लेते हैं
चल खड़े होंगे तो हस्ती मैं न फिर ठहरेंगे
जान-ए-जाँ चंद नफ़स दम ये बशर लेते हैं
है इशारा यही मू-हा-ए-मिज़ा का उन की
हम वो नश्तर हैं कि जो ख़ून-ए-जिगर लेते हैं
सामना करते हैं जिस वक़्त गदा का तेरे
बादशह तख़्त-ए-रवाँ पर से उतर लेते हैं
सिक्का-ए-दाग़-ए-जुनूँ पास हैं रहना होश्यार
लोग रस्ते में 'शरफ़' जेब कतर लेते हैं
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