ग़ज़ल कब से अधूरी है मोहब्बत की
किसी दिन इश्क़ को मतला दिया जाए
किसी दिन इश्क़ को मतला दिया जाए
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हर अदा अंगार थी महबूब की सो
फूँक डाला इश्क़ चाहत के चिलम से
फूँक डाला इश्क़ चाहत के चिलम से
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हम फ़क़त कुछ ख़याल लिखते हैं
आप लेकिन कमाल लिखते हैं
आप लेकिन कमाल लिखते हैं
शे'र मक़बूल ज़िक्र से तेरे
हम कहाँ बेमिसाल लिखते हैं
हो चुका हिज्र आपसे अब हम
इश्क़ का इंतिक़ाल लिखते हैं
शे'र बनते नहीं रईसी में
शा'इरी पाएमाल लिखते हैं
जंग से कम नहीं मोहब्बत सो
इश्क़ का रंग लाल लिखते हैं
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