ज़िंदगी में आई वो जैसे मेरी तक़दीर हो
और उसी तक़दीर से फिर चोट खाना याद है
मैं किसी की याद में हँसता भी हूँ रोता भी हूँ
दिल में आने जाने वाला एक ही मेहमान है
निशानी सब मिटाना चाहता हूँ
तुम्हें यकसर भुलाना चाहता हूँ
मेरे इक काम में तुम साथ दोगी
तुम्हारा दिल चुराना चाहता हूँ
मोहब्बत के बहाने से मैं पहले
वफ़ा को आज़माना चाहता हूँ
तमन्ना है मेरे दिल में रहो तुम
मकाँ को घर बनाना चाहता हूँ
है चाहत ये तेरी हर बात मानूँ
उदासी सर चढाना चाहता हूँ
वो मेरी रूह तक क़ब्ज़ा चुकी है
मैं जिसको छोड़ जाना चाहता हूँ
तुम्हें तो मेरी जाँ मोहब्बत थी मुझसे
बिछड़ने का क्यूँ फिर मलाल अब नहीं है
सुब्ह-ओ-शाम अब हमको बस उदास रहना है
ग़मज़दों की मंज़िल का रास्ता उदासी है