ग़मों में डूब कर ये सोचता हूँ
मिली ख़ुशियाँ जहाँ पे ग़म वहीं क्यूँ
मिली ख़ुशियाँ जहाँ पे ग़म वहीं क्यूँ
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इश्क़ में सब कुछ हक़ीक़त
मैं भी क्या क्या सोचता हूँ
मैं भी क्या क्या सोचता हूँ
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दिल के दरवाज़े पे पहरेदार कैसा
चाहने वालों से ये व्यवहार कैसा
चाहने वालों से ये व्यवहार कैसा
इक नज़र में दिल मिरा घाइल हुआ है
उस की आँखों में छुपा हथियार कैसा
जो निभानी पड़ रही मजबूरियों में
सोचता हूँ मैं भी ये किरदार कैसा
भूख की ख़ातिर जो फिरता दर बदर है
वो कभी समझा कहाँ त्यौहार कैसा
इश्क़ के अंजाम से मैं डर रहा हूँ
कर रहा 'रंजन' ये कारोबार कैसा
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करने लगा सब याद मैं
या'नी हुआ बर्बाद मैं
या'नी हुआ बर्बाद मैं
इस इश्क़ में अव्वल थे तुम
औ' फिर तुम्हारे बा'द मैं
वीरान है कितनों का घर
कैसे करूँ आबाद मैं
पंछी को देकर इक क़फ़स
कब तक फिरूँ आज़ाद मैं
रंजन गया सब छोड़कर
करता रहा फ़रियाद मैं
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