तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए
तुझसे नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए
उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए
क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए
जो था नहीं कभी वो त'अल्लुक़ निभाने में
इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए
अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से
हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए
हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी
मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए
तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी
फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए
तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया
देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए
यूँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का
मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए
कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन
शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए
क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले
क्यों ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए
अपने टूटे फूटे ख़्वाबों की ताबीर बनाता हूँ
मैं बिखरे लफ्ज़ों से काग़ज़ पर तस्वीर बनाता हूँ
बहुत से ग़म समेट कर बनाई एक डायरी
चुवाव देख रात भर बनाई एक डायरी
ये हर्फ़ हर्फ़ लफ़्ज़ लफ़्ज़ क़ब्र है वरक़ वरक़
दिल-ए-हज़ीं से इस क़दर बनाई एक डायरी
यही बस इक हक़ीक़त है, मुझे तुमसे मुहब्बत है
मगर हम मिल नहीं पाए, ये अपनी कैसी क़िस्मत है
हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था
बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था
चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी
साथ में सिगरट जलाना चल रहा था
गर मैं साकी बहका हूँ, नाराज़ क्यों है
अपना तो पीना पिलाना चल रहा था
यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे
जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था
दर्द लेकर बैठे थे महफ़िल में हम सब
और ग़म का कारख़ाना चल रहा था
कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस
आदमी का आना जाना चल रहा था
कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब
वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था
जाम उसके तर्ज़ पर ही था बनाया
देखो फिर भी उसका ना ना चल रहा था
कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे
ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था
लौट आए सब उसे बस देख कर के
आग पर जो इक दिवाना चल रहा था
लोग पानी जब बहाने में लगे थे
मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था
मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी
इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था
गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इसलिए सब
क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था
तेरे सीने में रौशन हो मुहब्बत के दिए हर दम
ले तू जाते हुए मेरा भी ये दिल साथ लेता जा
क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है
दिल में बस यादों का मेला चल रहा है
कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब
चाहता है जो वो वैसा चल रहा है
बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर
और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है
रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें
उसपे ये नुसरत का गाना चल रहा है
पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी
पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है
वक़्त मेरा हिज़्र का है यार लेकिन
एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है
जिंदा रहना और करना शायरी भी
काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है
फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर
क्या है जो इतना महकता चल रहा है
लोग अक्सर घर पे आकर कहते है अब
आपका साहब ये बेटा चल रहा है
मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ
धूप में पर मेरा साया चल रहा है