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बहुत से ग़म समेट कर बनाई एक डाइरी
चुवाव देख रात भर बनाई एक डाइरी
चुवाव देख रात भर बनाई एक डाइरी
ये हर्फ़ हर्फ़ लफ़्ज़ लफ़्ज़ क़ब्र है वरक़ वरक़
दिल-ए-हज़ीं से इस क़दर बनाई एक डाइरी
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हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था
बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था
बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था
चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी
साथ में सिगरट जलाना चल रहा था
गर मैं साक़ी बहका हूँ, नाराज़ क्यूँ है
अपना तो पीना पिलाना चल रहा था
यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे
जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था
दर्द ले कर बैठे थे महफ़िल में हम सब
और ग़म का कारख़ाना चल रहा था
कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस
आदमी का आना जाना चल रहा था
कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब
वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था
जाम उस के तर्ज़ पर ही था बनाया
देखो फिर भी उस का ना ना चल रहा था
कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे
ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था
लौट आए सब उसे बस देख कर के
आग पर जो इक दिवाना चल रहा था
लोग पानी जब बहाने में लगे थे
मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था
मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी
इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था
गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इस लिए सब
क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था
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क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है
दिल में बस यादों का मेला चल रहा है
दिल में बस यादों का मेला चल रहा है
कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब
चाहता है जो वो वैसा चल रहा है
बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर
और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है
रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें
उस पे ये नुसरत का गाना चल रहा है
पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी
पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है
वक़्त मेरा हिज्र का है यार लेकिन
एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है
ज़िंदा रहना और करना शा'इरी भी
काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है
फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर
क्या है जो इतना महकता चल रहा है
लोग अक्सर घर पे आ कर कहते है अब
आप का साहब ये बेटा चल रहा है
मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ
धूप में पर मेरा साया चल रहा है
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