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क्यूँ आज है दुरुस्त लड़ाई पता करो
क्यूँ फूल की दुकान हटाई पता करो
क्यूँ फूल की दुकान हटाई पता करो
ये पाँव मय-कदे कि तरफ़ बढ़ नहीं रहे
किस ने मिरी शराब छुड़ाई पता करो
ऐसी अगन मची कि मिरे ख़्वाब जल गए
कैसे हवा ने आग लगाई पता करो
इक गांव के हकीम ये कह कह के मर गए
कुछ इश्क़ का इलाज दवाई पता करो
मैं भी सदीक़ शाइरों के बीच में रहा
मेरी भी आदतें या बुराई पता करो
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पेशानी में ऐसी हरकत है अब क्यूँ
फैली ख़ामोशी है दहशत है अब क्यूँ
फैली ख़ामोशी है दहशत है अब क्यूँ
अपनी-अपनी साँसें रख कर समझाओ
मुर्दों को लहदों से नफ़रत है अब क्यूँ
मुझ को हैरानी है मरने पर मेरे
दोज़ख़ में चर्चे हैं इज़्ज़त है अब क्यूँ
तुम हाथों में आतिश ले कर चलते थे
पानी से जलने की हसरत है अब क्यूँ
मिल जाती है जिन को ग़म से आज़ादी
फिर भी वो पूछेंगे ज़हमत है अब क्यूँ
तय था सूरज को गर्दिश से खीचेंगे
तरकीबों की भारी क़िल्लत है अब क्यूँ
सर पे छत है तब भी क्या नाकाफ़ी है
आख़िर दीवारों की क़ीमत है अब क्यूँ
ऊँची आवाज़ों में भरते हैं हामी
मैं भी सोचूँ सारे सहमत हैं अब क्यूँ
किन ख़्वाबों में डूबे-डूबे रहते हैं
तुझ में मुझ में सब में ग़फ़लत है अब क्यूँ
कहता है 'तुम चौथी सफ़ में आ जाओ'
रहबर को भी इतनी फ़ुर्सत है अब क्यूँ
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मैं चाहूँगा ऐसा मंज़र दिख जाए
तेरे मेरे सबके अंदर दिख जाए
तेरे मेरे सबके अंदर दिख जाए
वो सब अपने होंगे तो भी डरना मत
गर उन के हाथों में ख़ंजर दिख जाए
मेरी नज़रों से देखो तो मुमकिन है
ज़र्रे ज़र्रे में भी अंतर दिख जाए
दिल के रेगिस्तां में बैठो कब कोई
जादू-वादू ,जंतर-मंतर दिख जाए
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