कुछ भी नहीं है पास मिरे अब सिवाए याद
शो'ला सा जल रहा है दर-ए-दिल मताअ'-ए-याद
शो'ला सा जल रहा है दर-ए-दिल मताअ'-ए-याद
तन्हाइयों में भी कभी तन्हा नहीं हूँ मैं
आ बैठती है पास मिरे बिन-बुलाए याद
शब-भर मैं लुत्फ़ लेता रहा हूँ इसी तरह
सारी ही रात चलती रही है हवा-ए-याद
ऐसे बिछड़ कि दिल में कोई बात रह न जाए
क्या जानिए कि फिर कभी आए न आए याद
थक हार के वो मेरे ही पहलू में सोएगी
दिन भर जो मारी मारी फिरी साए साए याद
क्या हाल कर लिया है ज़रा हाल-ए-दिल कहो
पहले तो तुम नहीं थे कभी मुब्तला-ए-याद
मैं कर तो लूँगा तर्क-ए-मोहब्बत मगर 'यशब'
मुमकिन नहीं कि उस की मिरे दिल से जाए याद
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रोता हुआ वो बाम मुझे याद है अभी
दिल में बिखरती शाम मुझे याद है अभी
दिल में बिखरती शाम मुझे याद है अभी
फिर कैसे हो गया है वही शख़्स इतना ख़ास
समझे थे जिस को आम मुझे याद है अभी
हम और साथ साथ कभी इस तरह मिलें
जैसे ख़याल-ए-ख़ाम मुझे याद है अभी
वो गुफ़्तुगू निगाहों निगाहों में याद है
सरगोशी में सलाम मुझे याद है अभी
कैसे सँभल सँभल के बड़ा देख-भाल कर
हम तुम थे हम-कलाम मुझे याद है अभी
क्या दिन थे ख़्वाहिशों की बड़ी रेल-पेल थी
जज़्बों का इज़िदहाम मुझे याद है अभी
पूछा कि मेरे दिल में इक़ामत है कब तलक
उस ने कहा मुदाम मुझे याद है अभी
पूछा कि ज़िंदगी में मिरा हम-सफ़र है कौन
मैं ने कहा ग़ुलाम मुझे याद है अभी
अब तक वो ज़ाइक़ा भी मुझे याद है 'यशब'
हम ने पिया था जाम मुझे याद है अभी
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शाम को उस ने मेरी ख़ातिर सजना छोड़ दिया
मैं ने भी दफ़्तर से जल्दी आना छोड़ दिया
मैं ने भी दफ़्तर से जल्दी आना छोड़ दिया
कब तक उस के हिज्र में आँखें रोतीं आख़िर को
दरिया ने भी अपने रुख़ पर बहना छोड़ दिया
पहले पहले हम ने कहना सुनना छोड़ा था
होते होते हम ने बातें करना छोड़ दिया
उस ने ख़्वाब में आने की उम्मीद बँधाई है
हिज्र की शब को मैं ने तारे गिनना छोड़ दिया
जब से अपने दिल के उस ने ज़ख़्म दिखाए हैं
मैं ने भी मोनिस से बातें करना छोड़ दिया
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तर्क उल्फ़त में भी उस ने ये रिवायत रक्खी
रोज़ मिलने की पुरानी वही आदत रक्खी
रोज़ मिलने की पुरानी वही आदत रक्खी
तू गया है तो पलट कर नहीं पूछा मैं ने
वर्ना बरसों तिरी यादों की अमानत रक्खी
कल अचानक कोई तस्वीर बनी काग़ज़ पर
मुद्दतों सब से छुपा कर तेरी सूरत रक्खी
वो मुक़द्दर में नहीं है तो उसी के दिल में
किस ने हर शय से ज़ियादा चाहत रक्खी
ख़ुद ही मिलता है बिछड़ता है 'यशब' अपने लिए
आने-जाने की अजब उस ने सुहूलत रक्खी
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ख़्वाब ता'बीर में बदलता है
उस में लेकिन ज़माना लगता है
उस में लेकिन ज़माना लगता है
जब उसे चाहतें मुयस्सर हों
ख़ुद-ब-ख़ुद आदमी बदलता है
पहले ये दिल कहाँ धड़कता था
अब हर इक बात पर धड़कता है
हाँ मिरी ख़्वाहिशें ज़ियादा हैं
हाँ वो इस बात को समझता है
सर-ब-सर वस्ल की तमन्ना में
वो बदन रूह में उतरता है
रात भी बन-सँवर के आती है
दिन भी उतरा के अब निकलता है
हो के सैद-ए-ग़म-ए-जहाँ ये खुला
ग़म से इक रास्ता निकलता है
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ऐसा भी नहीं दर्द ने वहशत नहीं की है
इस ग़म की कभी हम ने इशाअत नहीं की है
इस ग़म की कभी हम ने इशाअत नहीं की है
जब वस्ल हुआ उस से तो सरशार हुए हैं
और हिज्र के मौसम ने रिआ'यत नहीं की है
जो तू ने दिया उस में इज़ाफ़ा ही हुआ है
इस दर्द की दौलत में ख़यानत नहीं की है
हम ने भी अभी खोल के रक्खा नहीं दिल को
तू ने भी कभी खुल के वज़ाहत नहीं की है
इस शहर-ए-बदन के भी अजब होते हैं मंज़र
लगता है अभी तुम ने सियाहत नहीं की है
इस अर्ज़-ए-तमन्ना में किसे चैन मिला है
दिल ने मगर इस ख़ौफ़ से हिजरत नहीं की है
ये दिल के उजड़ने की अलामत न हो कोई
मिलने पे घड़ी-भर को भी हैरत नहीं की है
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वस्ल भी हिज्र था विसाल न था
मिल रहे थे मगर ख़याल न था
मिल रहे थे मगर ख़याल न था
मिल रहे थे कि दोनों तन्हा थे
गुफ़्तुगू में भी क़ील-ओ-क़ाल न था
मेरे और उस के दरमियान अभी
कोई भी सिलसिला बहाल न था
रास्ते ख़त्म हो चुके थे मगर
वापसी का कोई सवाल न था
ये भी इक मरहला तमाम हुआ
हो गए थे जुदा मलाल न था
वो तिरा हुस्न हो कि इश्क़ मिरा
कोई पाबंद-ए-माह-ओ-साल न था
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