10
0 Likes
9
0 Likes
ख़्वाब की सल्तनत से उधर
इक जहाँ है जिसे आँख आबाद कर ले तो कर ले
इक जहाँ है जिसे आँख आबाद कर ले तो कर ले
वहाँ साए ही साए हैं
अक्सर ओ बेश-तर धूप में रक़्स करते हुए
रेज़गारी की आवाज़ पर धड़कनें ताल देती हैं तो झिलमिलाते हैं
आँखों में ख़्वाब
(अपना घर उस के दार-उल-ख़िलाफ़े में है)
सुब्ह से शाम तक
नोट गिनती हुई उँगलियाँ यूँ थिरकती हैं
जैसे तमन्नाओं को थपकियाँ दे शब-ए-हिज्र में एक ब्रिहन का दिल
रोज़ ख़्वाबों की पूँजी में सिक्कों के गिरने से इक गूँज उठती है
गोया कहीं टीन की छत पे बारिश के क़तरे पड़ें
रोज़ इक घर तमन्ना के मलबे से आँखों के पाताल में झाँकता है
वही बे-घरी बे-ज़मीनी का दुख आज तक मुझ को घेरे हुए है
मैं चाँद और सूरज की सूरत फ़लक-दर-फ़लक तैरता हूँ
मिरे ख़्वाब मुझ को उड़ाए लिए जा रहे हैं
मैं पामाल होती हुई आरज़ू में कहाँ तक जि
यूँगा
Read Fullअक्सर ओ बेश-तर धूप में रक़्स करते हुए
रेज़गारी की आवाज़ पर धड़कनें ताल देती हैं तो झिलमिलाते हैं
आँखों में ख़्वाब
(अपना घर उस के दार-उल-ख़िलाफ़े में है)
सुब्ह से शाम तक
नोट गिनती हुई उँगलियाँ यूँ थिरकती हैं
जैसे तमन्नाओं को थपकियाँ दे शब-ए-हिज्र में एक ब्रिहन का दिल
रोज़ ख़्वाबों की पूँजी में सिक्कों के गिरने से इक गूँज उठती है
गोया कहीं टीन की छत पे बारिश के क़तरे पड़ें
रोज़ इक घर तमन्ना के मलबे से आँखों के पाताल में झाँकता है
वही बे-घरी बे-ज़मीनी का दुख आज तक मुझ को घेरे हुए है
मैं चाँद और सूरज की सूरत फ़लक-दर-फ़लक तैरता हूँ
मिरे ख़्वाब मुझ को उड़ाए लिए जा रहे हैं
मैं पामाल होती हुई आरज़ू में कहाँ तक जि
यूँगा
8
0 Likes
7
0 Likes
वही बहार ओ ख़िज़ाँ है मुझ में भी
मुझ से बाहर भी
मुझ से बाहर भी
(आदमी से अलग नहीं हूँ)
शगूफ़े फूटें तो ख़ून में गीत बोलते हैं
कभी कभी ख़ार की खटक टीस बन के होंटों से झाँकती है
न-जाने कितने ही गीत थे जो बहार से पहले
शाख़ की रग में जी रहे थे
जड़ों का बुख़्ल उन को खा गया है
ये ख़ार, सौतेले बेटे शाख़ों के
इन तक आया नहीं है नम
फिर भी जी रहे हैं
(चमकते सूरज का सारा सच उन के बत्न में है)
तपिश की शिद्दत को पी के सूखे सड़े हुए हैं
प जी रहे हैं
मुझे ख़िज़ाँ और बहार के राबतों में जीना है
फूल का इल्तिफ़ात काँटे के तल्ख़ ता'ने
मिरे हवाले हैं
जड़ का नम, आफ़्ताब की तब
मिरे हुनर में ही बोलती है
मैं कितनी सतहों पे जी रहा हूँ
कभी कोई फूल मुस्कुराए
कभी कोई ख़ार दिल दुखाए
तो मुझ तक आना
ये नज़्म दोनों का माजरा है
Read Fullशगूफ़े फूटें तो ख़ून में गीत बोलते हैं
कभी कभी ख़ार की खटक टीस बन के होंटों से झाँकती है
न-जाने कितने ही गीत थे जो बहार से पहले
शाख़ की रग में जी रहे थे
जड़ों का बुख़्ल उन को खा गया है
ये ख़ार, सौतेले बेटे शाख़ों के
इन तक आया नहीं है नम
फिर भी जी रहे हैं
(चमकते सूरज का सारा सच उन के बत्न में है)
तपिश की शिद्दत को पी के सूखे सड़े हुए हैं
प जी रहे हैं
मुझे ख़िज़ाँ और बहार के राबतों में जीना है
फूल का इल्तिफ़ात काँटे के तल्ख़ ता'ने
मिरे हवाले हैं
जड़ का नम, आफ़्ताब की तब
मिरे हुनर में ही बोलती है
मैं कितनी सतहों पे जी रहा हूँ
कभी कोई फूल मुस्कुराए
कभी कोई ख़ार दिल दुखाए
तो मुझ तक आना
ये नज़्म दोनों का माजरा है
6
0 Likes
5
0 Likes
4
0 Likes
3
0 Likes
हमारा डूबना मुश्किल नहीं था
नज़र में दूर तक साहिल नहीं था
नज़र में दूर तक साहिल नहीं था
कहाँ था गुफ़्तुगू करते हुए वो
वो था भी तो सर-ए-महफ़िल नहीं था
मैं उस को सब से बेहतर जानता हूँ
जिसे मेरा पता हासिल नहीं था
ज़माने से अलग थी मेरी दुनिया
मैं उस की दौड़ में शामिल नहीं था
वो पत्थर भी था कितना ख़ूब-सूरत
जो आईना था लेकिन दिल नहीं था
हम उस धरती के बाशिंदे थे 'ताबिश'
कि जिस का कोई मुस्तक़बिल नहीं था
2
0 Likes
1
0 Likes









