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किसी पे अपना कमाल ज़ाहिर नहीं करेगा
वो फ़त्ह से पहले चाल ज़ाहिर नहीं करेगा
वो फ़त्ह से पहले चाल ज़ाहिर नहीं करेगा
जिलौ में ले कर चलेगा लश्कर मगर अदू पर
वो अपना जल्वा जलाल ज़ाहिर नहीं करेगा
उसे कभी गुफ़्तुगू की मोहलत नहीं मिलेगी
जो आज भी दिल का हाल ज़ाहिर नहीं करेगा
ये दिल कि शफ़्फ़ाफ़ आइना ही सही मगर अब
तिरा मुकम्मल जमाल ज़ाहिर नहीं करेगा
उसे हुई है ये पहली पहली शिकस्त 'शहज़ाद'
अभी वो अपना मलाल ज़ाहिर नहीं करेगा
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हम ने हर ग़म दिल-ए-सद-चाक से बाहर रक्खा
आग को पैरहन-ए-ख़ाक से बाहर रक्खा
आग को पैरहन-ए-ख़ाक से बाहर रक्खा
ज़ेब-ए-तन हम ने भी कर रक्खी ये दुनिया लेकिन
तेरे हर रंग को पोशाक से बाहर रक्खा
ख़्वाब-दर-ख़्वाब तुझे ढूँडने वालों ने भी अब
नींद को दीदा-ए-नमनाक से बाहर रक्खा
इक तरह ध्यान ही ऐसा कि जिसे हम ने यहाँ
नफ़अ' नुक़सान के पेचाक से बाहर रक्खा
उजरत-ए-इश्क़ बहुत कम थी सौ हम ने 'शहज़ाद'
दिल को इस तंगी-ए-अफ़्लाक से बाहर रक्खा
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