Qalaq Merathi

Top 10 of Qalaq Merathi

    मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता
    जो हो सकता है वो भी आदमी से हो नहीं सकता

    ये कहना है तो क्या कहना कि कहते कहते रुक जाना
    बयान-ए-हसरत-ए-दिल भी तो जी से हो नहीं सकता

    उचटती सी निगाहें कब जिगर के पार होती हैं
    करो ख़ूँ दोस्त बन कर दुश्मनी से हो नहीं सकता

    हमें क्यूँ दिल दिया और दिलरुबाई उन में क्यूँ रक्खी
    ख़ुदा दुश्मन बुतों की बंदगी से हो नहीं सकता

    दम-ए-रुख़्सत वो मुझ को देख कर बे-ख़ुद तो क्या होगा
    न उठने दें उन्हें ये भी ग़शी से हो नहीं सकता

    ब-रंग-ए-नाला किस किस धूम से उड़ता है रंग अपना
    तिरी फ़ुर्क़त का पर्दा ख़ामुशी से हो नहीं सकता

    'क़लक़' पैग़ाम तेरा और बयाँ फिर उस सितमगर से
    किसी से हो नहीं सकता किसी से हो नहीं सकता
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    तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं
    कि क़यामत पे भी क़याम नहीं

    बे-वफ़ाई तुम्हारी आम हुई
    अब किसी को किसी से काम नहीं

    किस लिए दावा-ए-ज़ुलेख़ाई
    ग़ैर यूसुफ़ नहीं ग़ुलाम नहीं

    वस्ल के बअ'द हिज्र का क्या काम
    दूर गर्दूं का इंतिज़ाम नहीं

    कौन सुनता है नाला-ओ-फ़रियाद
    चर्ख़ को ख़ौफ़-ए-इंतिक़ाम नहीं

    ख़ाल-ए-लब देख कर हुआ मालूम
    कोई दाना बग़ैर-ए-दाम नहीं

    आप में क्यूँ कि आऊँ जब कि तू आए
    ख़ल्वत-ए-ख़ास बज़्म-ए-आम नहीं

    नाला करता हूँ लोग सुनते हैं
    आप से मेरा कुछ कलाम नहीं

    जिस जगह है वहाँ भी है बोहतान
    कि किसी जा तिरा मक़ाम नहीं

    रोज़-ए-फ़ुर्क़त को रोज़-ए-हश्र न जान
    शाम पर भी तो इख़्तिताम नहीं

    है ख़ुदा ही 'क़लक़' जो आज बुझे
    सुब्ह होते नहीं कि शाम नहीं
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    तुझे कल ही से नहीं बे-कली न कुछ आज ही से रहा क़लक़
    तिरी उम्र सारी यूँही कटी तू हमेशा यूँही जिया 'क़लक़'

    हुआ दिल के जाने का अब यक़ीं कि वो दर्द-ए-बर में मरे नहीं
    न वो इज़्तिराब-ए-क़ज़ा कहीं न वो हश्र-ख़ेज़ बला 'क़लक़'

    मुझे हश्र कर दिया बैठना मुझे क़हर हो गया ठहरना
    है बसान-ए-सब्र गुरेज़-पा नहीं ग़म-गुसार मिरा क़लक़

    उन्हें नाला करने का रंज क्या उन्हें आह भरने का रंज क्या
    उन्हें मेरे मरने का रंज क्या उन्हें मेरे जाने का क्या क़लक़

    यही रश्क ने दिए मशवरे कभी पर्दा उन का न खोलिए
    मिरे जी ही जी में फिरा किए मिरे दिल ही दिल में रहा क़लक़

    न तो रोए ग़ैर न घर रहे न शब-ए-फ़िराक़ में मर रहे
    न वफ़ा करे न सितम सहे न जफ़ा हुई न हुआ क़लक़

    न वो मैं रहा न वो तू रहा न वो आरज़ू न वो मुद्दआ'
    हुआ ज़िंदगी का भी फ़ैसला मगर एक तेरा रहा क़लक़

    रहे लाख सद
    में नफ़स नफ़स जिए क्यूँ कि कोई पराए बस
    शब-ए-वस्ल मरने की थी हवस शब-ए-हिज्र जीने का था क़लक़

    नहीं चैन उन को भी एक दम कि है फ़िक्र-ए-जौर का ग़म सा ग़म
    हुए मुझ पे रोज़ नए सितम रहा उन को रोज़ नया क़लक़

    करे रब्त कोई किसी से क्या कि उठा तरीक़ निबाह का
    न करेगी तुझ से वफ़ा जफ़ा न करेगा मुझ से वफ़ा क़लक़

    मैं जला तो शो'ले में जोश था जो हुआ मैं ख़ाक है ज़लज़ला
    मैं हज़ार शक्ल बदल चुका प किसी तरह न छुपा क़लक़

    नहीं तेरे फिरने का कुछ गिला कि ज़माना सारा बदल गया
    जो शब-ए-विसाल में चैन था वही रोज़-ए-हिज्र बना क़लक़

    वो है इल्तिफ़ात दम-ए-सितम कि ज़ियादा इस से नहीं करम
    मिरे चाक-ए-दिल का रफ़ू अलम मिरे दर्द-ए-जाँ की दवा क़लक़

    गए वाँ भी पर न घटा अलम छुटे सब से पर न छुटा अलम
    मिरे पास से न हटा अलम मिरे साथ से न टला क़लक़

    अभी था सला-ए-ज़न-ए-सबक़ अभी थी किताब-ए-वरक़-वरक़
    कभी मदरसे में रहा 'क़लक़' कभी मय-कदे में रहा 'क़लक़'
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    रिश्ता-ए-रस्म-ए-मोहब्बत मत तोड़
    तोड़ कर दिल को क़यामत मत तोड़

    काम-ए-नाकामी भी इक काम सही
    तोड़ उम्मीद को हिम्मत मत तोड़

    रात फ़ुर्क़त की पड़ी है ऐ दिल
    एक ही नाले में ताक़त मत तोड़

    उस की रहमत को न बे-कार समझ
    मय-ओ-मयख़ाने की निय्यत मत तोड़

    देख अच्छी नहीं ये ख़र-मस्ती
    साग़र-ए-बादा-ए-फ़ुर्सत मत तोड़

    दिल उम्मीद-ए-रिहाई मत बाँध
    और आफ़त सर-ए-आफ़त मत तोड़

    पूछ मत लज़्ज़त-ए-मय ऐ वाइज़
    जानवर दाम-ए-शरीअत मत तोड़
    सहन-ए-मस्जिद को किए जा पामाल
    क़ैद-ए-आईन-ए-तरीक़त मत तोड़

    मय-कदा देख के जन्नत को न भूल
    हिर्स से बंद-ए-क़नाअत मत तोड़

    इस का एहसान उठाना है हमें
    गर्दन ऐ बार-ए-नदामत मत तोड़

    ऐ 'क़लक़' बुत-कदे में बाँध एहराम
    हम से लिल्लाह रिफ़ाक़त मत तोड़
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    जो दिलबर की मोहब्बत दिल से बदले
    तो लूँ उम्मीद-ए-ला-हासिल से बदले

    मुहाल-ए-अक़्ल कोई शय नहीं है
    जो आसानी मिरी मुश्किल से बदले

    जहाँ है कोर और ख़ुर्शीद महजूब
    कहाँ तक शम्अ'' हर महफ़िल से बदले

    तही-दस्त-ए-मोहब्बत तो भी समझो
    जो जम-साग़र को जाम-ए-गिल से बदले

    हर इक को जान देने की ख़ुशी हो
    अजल गर नावक-ए-क़ातिल से बदले

    अगर हो चीं-जबीं क़ातिल दम-ए-क़त्ल
    क़यामत क़ामत-ए-क़ातिल से बदले

    अभी हम तो अदू से भी बदल लें
    जो ग़म को ग़म से दिल को दिल से बदले

    खुले अहवाल-ए-दिल जब नासेहों पर
    तह-ए-दरिया अगर साहिल से बदले

    शबिस्ताँ छोड़ कर लैला हो मजनूँ
    मिरी आग़ोश गर महमिल से बदले

    न जुम्बिश इक क़दम हो आसमाँ से
    मिरी मंज़िल अगर मंज़िल से बदले

    बुतों का जल्वा काबे में दिखा दें
    ज़रा तक़्वा दिल-ए-माइल से बदले

    'क़लक़' उस ज़ुल्म का फिर क्या ठिकाना
    अगर मक़्तूल ले क़ातिल से बदले
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    ख़ुद देख ख़ुदी को ओ ख़ुद-आरा
    पहचान ख़ुदा को भी ख़ुदा-रा

    तिरछी ये निगाह है कि आरा
    हर जुज़्व-ए-जिगर है पारा पारा

    देखेंगे बुतों की हम कजी को
    सीधा है अगर ख़ुदा हमारा

    क्यूँ मौत के आसरे पे जीते
    ऐ ज़ीस्त हमें तो तू ने मारा

    अल्लाह-रे दिल की बे-क़रारी
    खाता ही नहीं कहीं सहारा

    जाँ देनी है मेरी आज़माइश
    दिलदारी है इम्तिहाँ तुम्हारा

    तूफ़ान है जोश-ए-तिश्ना-कामी
    दरिया भी तो कर गया किनारा

    शीरीनी-ए-जाँ की कब खुली क़दर
    जब ज़हर हुआ हमें गवारा

    हर शाख़ पे आशियाँ है लर्ज़ां
    इस बाग़ में हो चुका गुज़ारा

    गर्दिश का 'क़लक़' की देखना औज
    हर क़तरा-ए-ख़ूँ बना सितारा
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    वही वा'दा है वही आरज़ू वही अपनी उम्र-ए-तमाम है
    वही चश्म है वही राह है वही सुब्ह है वही शाम है

    वही ख़स्ता-हाल ख़राब है वही ख़्वाब कुश्ता-ए-ख़्वाब है
    वही ज़िंदगी को जवाब है न सलाम है न पयाम है

    वही जोश नाला-ओ-आह में वही शो'ला जान-ए-तबाह में
    वही बर्क़-ए-यास निगाह में जो ख़याल है सो वो ख़ाम है

    वही ख़्वाब-ओ-ख़ुर की तलाश है वही जान-ओ-दिल में ख़राश है
    वही रंज-ए-ग़ैर-ए-मआ'श है मुझे ज़िंदगी भी हराम है

    वही हिज्र दुश्मन-ए-वस्ल है वही मर्ग-ओ-ज़ीस्त में फ़स्ल है
    वही अपने शग़्ल से शग़्ल है वही अपने काम से काम है

    वही शक़ जिगर न सियो सियो वही ज़ीस्त है न जियो जियो
    वही ख़ून-ए-दिल न पियो पियो वही बादा है वही जाम है

    वही शौक़-ए-राह है रहनुमा वही जल्वा-गाह है रुख़-कुशा
    वही बज़्म-ए-नाज़ है जा-ब-जा वही हर क़दम पे मक़ाम है

    वही नीम-जाँ दम-ए-वापसीं वही नाला-कश सुख़न-ए-हज़ीं
    वही यास-ए-ज़ीस्त है दिल-नशीं कि ज़बाँ पे आप का नाम है

    वही रंज है तो यूँ ही सही वो 'क़लक़' ही था कि यूँ ही निभी
    मिरी आप को भी है बंदगी मिरा इश्क़ को भी सलाम है
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    दोस्ती उस की दुश्मनी ही सही
    दोस्त तो हो वो मुद्दई ही सही

    मस्ती-ओ-बहस-ए-उज़्र-ए-कफ़्फ़ारा
    तौबास तौबा हम ने की ही सही

    है अगर कुछ वफ़ा तो क्या कहने
    कुछ नहीं है तो दिल लगी ही सही

    जी है ये बिन लगे नहीं रहता
    कुछ तो हो शग़्ल-ए-आशिक़ी ही सही

    मोहतसिब ख़त्म कीजिए हुज्जत
    पी है तो ख़ैर हम ने पी ही सही

    हैफ़ ख़मयाज़-हा-ए-हसरत-ओ-शौक़
    ज़िंदगानी कशाकशी ही सही

    जान दे कर लिया है नाम-ए-वफ़ा
    मौत भी हम ने मोल ली ही सही

    मिलते हैं मुद्दई से मिलने दो
    कि मिरी ना-ख़ुशी ख़ुशी ही सही

    बोसा देने की चीज़ है आख़िर
    न सही हर घड़ी कभी ही सही

    क़त्ल होते हैं क़त्ल होते हैं
    अहद-ए-दिल दौर-ए-नादरी ही सही

    ऐ 'क़लक़' नासेहों से क्या तकरार
    मान इक बात मान ली ही सही
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    राज़-ए-दिल दोस्त को सुना बैठे
    मुफ़्त में मुद्दई बना बैठे

    अंजुमन है तिरी तिलिस्म-ए-रश्क
    आश्ना हैं जुदा जुदा बैठे

    कसरत-ए-सज्दास पशेमाँ हैं
    कि तिरा नक़्श-ए-पा मिटा बैठे

    कल जो ताज-ओ-हशम को छोड़ उठे
    आज वो तेरे दर पे आ बैठे

    की है आख़िर को नाश्ता-शिकनी
    दाग़ पर दाग़ हम तो खा बैठे

    तर्ज़-ए-साक़ी से दैर के सब लोग
    कर रहे हैं ख़ुदा ख़ुदा बैठे

    शाख़-ए-गुल की नज़ाकतों से डरे
    बार थे मुश्त-ए-पर उड़ा बैठे

    शिकवा आशिक़-कुशी का फ़र्ज़ न था
    याद ये क्या उन्हें दिला बैठे

    दर्द-ए-सर थी दुआ मोहब्बत में
    हाथ हम जान से उठा बैठे

    ऐ क़यामत तू उठ के पूछ मिज़ाज
    हैं वो कुछ आप ही ख़फ़ा बैठे

    रोए इतने कि ख़ूँ हुई उम्मीद
    ख़ुद जहाज़ अपना हम बहा बैठे

    बे-तकल्लुफ़ मक़ाम-ए-उल्फ़त है
    दाग़ उट्ठे कि आबला बैठे

    आसमाँ ढह पड़ा उठे फ़ित्ने
    जिस जगह ले के मुद्दआ' बैठे

    रस्म-ए-ताज़ीम-ए-इश्क़ तो देखो
    दर्द उट्ठा कि जी मिरा बैठे

    ऐ 'क़लक़' तुम सा बद-दिमाग़ है कौन
    चर्ख़ की ज़िद पे घर लुटा बैठे
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    कोई कैसा ही साबित हो तबीअ'त आ ही जाती है
    ख़ुदा जाने ये क्या आफ़त है आफ़त आ ही जाती है

    वो कैसे ही चलें थम थम क़यामत आ ही जाती है
    बचे कोई किसी ढब से प शामत आ ही जाती है

    सितम कर के सितम-गर की नज़र नीची ही रहती है
    बुराई फिर बुराई है नदामत आ ही जाती है

    ज़ुलेख़ा बे-ख़िरद आवारा लैला बद-मज़ा शीरीं
    सभी मजबूर हैं दिल से मोहब्बत आ ही जाती है

    चराग़-ओ-शम्अ बज़्म-ए-यार कर कर ग़ैर को फूँका
    दिल-ए-अफ़सुर्दा में आख़िर हरारत आ ही जाती है

    हुआ नज़रों ही नज़रों में वो महशर बर्क़-ए-सद-ख़िर्मन
    मोहब्बत की निगाहों से शरारत आ ही जाती है

    पसीना आ गया उन को किया वा'दा जो आने का
    बुरी है नाज़ बरादारी नज़ाकत आ ही जाती है

    हर इक से अब वो कहते हैं कि लो हम पर ये मरते हैं
    जिएँगे इस तरह कब तक कि ग़ैरत आ ही जाती है

    नहीं कुछ दिल का फिरना अहद-ए-दुश्मन से तिरा फिरना
    मगर कुछ सोच कर आख़िर मुरव्वत आ ही जाती है

    न होती गर नवेद-ए-मर्ग क्यूँ कर हिज्र में जीते
    मोहब्बत में भी आसाइश पे निय्यत आ ही जाती है

    विसाल-ए-ग़ैर के क़िस्से को सुन कर क्या तड़पता हूँ
    ये अरमाँ कोई जा सकता है हसरत आ ही जाती है

    अगर सद-साल कीजे शुक्र-ए-उल्फ़त कीजिए लेकिन
    ये वो शेवा है बद-ज़न फिर शिकायत आ ही जाती है

    'क़लक़' ख़त ग़ैर का क्यूँ कर न आता क्यूँ न तुम पढ़ते
    क़ज़ा लिखी हुई हज़रत-सलामत आ ही जाती है
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