ग़म-ए-गुनाह से फ़िक्र-नजात से उलझे
तमाम उम्र हम अफ़्सून-ए-ज़ात से उलझे
तमाम उम्र हम अफ़्सून-ए-ज़ात से उलझे
तवहहुमात से इक जंग थी जो जारी रही
सहाब-ए-मर्ग न अब्र-ए-हयात से उलझे
नफ़स नफ़स पे निगाहें तिरी बदलती रहीं
क़दम क़दम पे नए हादसात से उलझे
तुझे जो मान लिया हम ने बस वो मान लिया
ज़बाँ सिफ़त पे न खोली न ज़ात से उलझे
कभी ख़िरद से निपटना पड़ा कभी दिल से
तग़य्युरात से उलझे सबात से उलझे
बहुत सताया गुज़िश्ता दिनों की यादों ने
यही नहीं कि नए वाक़िआ''त से उलझे
तज़ाद लाख रहा फिर भी ज़िंदगी के लिए
ग़म-ए-अना से ग़म-ए-काएनात से उलझे
हम इस ज़माने में किस को सुनाएँ कौन सुने
दिल-ओ-निगाह की जिन वारदात से उलझे
बिसात-ए-ज़ीस्त सजाई तिरी ख़ुशी के लिए
न जीत से कभी उलझे न मात से उलझे
हमीं ने तेरी निगाह-ए-ग़ज़ब को झेला है
हमीं तिरी निगह-ए-इल्तिफ़ात से उलझे
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हाए रे अहद-ए-गुज़िश्ता की करम-फ़रमाइयाँ
अंजुमन-दर-अंजुमन तन्हाइयाँ तन्हाइयाँ
अंजुमन-दर-अंजुमन तन्हाइयाँ तन्हाइयाँ
इश्क़ को हासिल हैं उन की भी करम-फ़रमाइयाँ
उम्र भर करते रहे हैं जो सितम-आराईयाँ
मिल के दोनों ने मुझे रुस्वा-ए-दुनिया कर दिया
कुछ मेरी नादानियाँ थीं कुछ तिरी दानाइयाँ
लफ़्ज़-ओ-मा'नी में उलझ कर रह गए अहबाब सब
काश कोई देख सकता क़ल्ब की गहराइयाँ
अब ख़ुलूस-ए-दिल की बातें ख़्वाब हो कर रह गईं
जिस तरफ़ देखो फ़क़त परछाइयाँ परछाइयाँ
कोई हँसता तो नहीं आँसू बहाने पर मिरे
बाइ'स-ए-तस्कीन-ए-ख़ातिर हैं मुझे तन्हाइयाँ
देखिए ये भी कि दिल का ख़ून होता तो नहीं
वज्ह-ए-रौनक़ ही सही ये अंजुमन-आराइयाँ
मेरी नज़रों ने उन्हें कुछ गुदगुदाया इस तरह
करवटें लेने लगीं सोई हुई अंगड़ाइयाँ
अहल-ए-दुनिया से शिकायत क्या गिला क्या रंज क्या
मुझ को ले डूबीं मिरे एहसास की गहराइयाँ
दर्द-ए-दिल जब तक न शामिल हो तो 'क़ादिर' शे'र क्या
ज़िंदगी भर करते रहिए क़ाफ़िया-पैमाइयाँ
Read Fullउम्र भर करते रहे हैं जो सितम-आराईयाँ
मिल के दोनों ने मुझे रुस्वा-ए-दुनिया कर दिया
कुछ मेरी नादानियाँ थीं कुछ तिरी दानाइयाँ
लफ़्ज़-ओ-मा'नी में उलझ कर रह गए अहबाब सब
काश कोई देख सकता क़ल्ब की गहराइयाँ
अब ख़ुलूस-ए-दिल की बातें ख़्वाब हो कर रह गईं
जिस तरफ़ देखो फ़क़त परछाइयाँ परछाइयाँ
कोई हँसता तो नहीं आँसू बहाने पर मिरे
बाइ'स-ए-तस्कीन-ए-ख़ातिर हैं मुझे तन्हाइयाँ
देखिए ये भी कि दिल का ख़ून होता तो नहीं
वज्ह-ए-रौनक़ ही सही ये अंजुमन-आराइयाँ
मेरी नज़रों ने उन्हें कुछ गुदगुदाया इस तरह
करवटें लेने लगीं सोई हुई अंगड़ाइयाँ
अहल-ए-दुनिया से शिकायत क्या गिला क्या रंज क्या
मुझ को ले डूबीं मिरे एहसास की गहराइयाँ
दर्द-ए-दिल जब तक न शामिल हो तो 'क़ादिर' शे'र क्या
ज़िंदगी भर करते रहिए क़ाफ़िया-पैमाइयाँ
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गया वो दौर तो ख़्वाबों के सिलसिले भी गए
दिल-ओ-निगाह के पुर-कैफ़ हौसले भी गए
दिल-ओ-निगाह के पुर-कैफ़ हौसले भी गए
वही गए तो फिर अब शिक्वा-ओ-शिकायत क्या
शिकायतें गईं शिकवे गए गिले भी गए
बिखर के रह गई तस्वीर आरज़ूओं की
उम्मीद-ओ-आस-ओ-तमन्ना के क़ाफ़िले भी गए
यही नहीं कि बहुत सी लताफ़तें रूठीं
अदा-ओ-नाज़ के रंगीन मरहले भी गए
बुझे बुझे से हैं आशाओं के कँवल क़ादिर
ख़रोश-ए-ज़ीस्त गया दिल के वलवले भी गए
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सोचो तो क़यामत है छलावा है बला है
देखो तो फ़क़त राह में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है
देखो तो फ़क़त राह में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है
माना कि तिरे हक़ से तुझे कम ही मिला है
ये भी कभी सोचा है कि क्या तू ने दिया है
मैं क़ाफ़िला-ए-वक़्त के हमराह चलूँ क्या
जो शख़्स है पीछे की तरफ़ देख रहा है
औरों के तक़ाबुल में सदा पस्त रहा हूँ
ये भी मिरी ना-कर्दा-गुनाही की सज़ा है
अब अपने ही माज़ी पे यक़ीं आ नहीं पाता
लगता है ये क़िस्सा भी कभी मैं ने सुना है
दुनिया को जो छोड़ा था तो कुछ और था आलम
दुनिया को जो चाहा तो अजब हाल हुआ है
इस दौर को क्या सई-ए-हिदायत की ज़रूरत
जिस दौर का जो शख़्स है फ़रज़ाना बना है
ये भी मिरी क़िस्मत कि उलझ बैठा मैं इन में
कुछ ऐसे अमल जिन की सज़ा है न जज़ा है
उस ग़म को भला क्यूँ न मैं सीने से लगाऊँ
वो ग़म जो मिरे दोस्त तिरा हुस्न-ए-अता है
मुमकिन हो तो मिल जाओ किसी हाल में इक बार
अब वक़्त का सूरज है कि जो डूब रहा है
'क़ादिर' को शिकायत नहीं ग़ैरों की रविश से
'क़ादिर' को तो अपनों ही ने मायूस किया है
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तिरी दुनिया में ये क्या हो रहा है
हँसी होंटों पे है दिल रो रहा है
हँसी होंटों पे है दिल रो रहा है
हवा बद-कारियों की चल रही है
ज़मीर इंसानियत का सो रहा है
पड़ी हैं ख़ून की छींटें सभी पर
जिसे देखो वो दामन धो रहा है
बशर का ख़ून है पानी से सस्ता
तमाशा इक मुसलसल हो रहा है
उसी के मुन्हरिफ़ हम भी हैं 'क़ादिर'
जो दावा आज तक हम को रहा है
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रफ़्ता रफ़्ता दिल में इक उलझन नई पाते हैं हम
हम ये समझे थे कि उन को भूलते जाते हैं हम
हम ये समझे थे कि उन को भूलते जाते हैं हम
इस को क्या कीजे कि ये भी खेल है तक़दीर का
ढूँढ़ते हैं जब उन्हें अपना पता पाते हैं हम
चंद आहों पर हमारी है परेशानी उन्हें
सैकड़ों सद
में हैं जो ख़ामोश पी जाते हैं हम
ऐसी दुनिया से शिकायत क्या गिला क्या रंज क्या
फूल बरसाती है दुनिया आग बरसाते हैं हम
बे-तलब हुस्न-ए-अता की शान ही कुछ और है
आप कहते हैं तो लीजे हाथ फैलाते हैं हम
अपनी रूदाद-ए-अलम की अब वो मंज़िल आ गई
कोई सुनता हो न सुनता हो कहे जाते हैं हम
लीजिए तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का तहय्या कर लिया
देखना ये है उसे कब तक निभा पाते हैं हम
ऐ वफ़ूर-ए-ज़िंदगी तल्ख़ाबा-ए-हस्ती न पूछ
ज़ेहन की ख़ुश-फ़हमियों से दिल को बहलाते हैं हम
रंजिश-ए-बेजा ने उन की कर दिया आलम ही और
ज़िंदगी के नाम की गोया सज़ा पाते हैं हम
दोस्त ना-ख़ुश अक़रबा नाराज़ बरहम घर के लोग
सच का दामन थाम कर अच्छा सिला पाते हैं हम
कुछ अजब फ़ितरत है 'क़ादिर' दर्द-ए-दिल की आज-कल
जब कोई देता है तस्कीं और घबराते हैं हम
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अपनी मोहब्बतों का ये अच्छा सिला मिला
जो भी मिला मुझे वो मुझी से ख़फ़ा मिला
जो भी मिला मुझे वो मुझी से ख़फ़ा मिला
तुझ से बिछड़ के भी मैं न तुझ से बिछड़ सका
जिस राह पर गया मैं तिरा नक़्श-ए-पा मिला
अहल-ए-करम की भीड़ से गुज़री है ज़िंदगी
तुझ सा मगर कोई न करम-आश्ना मिला
दुनिया जफ़ा-शिआ'र रही है ये सच सही
ऐ रह-नवर्द राह-ए-वफ़ा तुझ को क्या मिला
इस को क़ुयूद-ए-अक़्ल ने दीवाना कर दिया
बाहर मिला मुझे तो वो अच्छा-भला मिला
ख़ुशियाँ मिलीं तो आँख झपकने की देर तक
ग़म जो मिला मुझे वो बहुत देर-पा मिला
इस मुख़्तसर हयात में किस किस को रोइए
हर मरहला हयात का सब्र-आज़मा मिला
नादीदा इक कशिश है नहीं जिस का कोई नाम
दिल से निगाह तक इक अजब सिलसिला मिला
बे-ए'तिनाइयों से मिली ताब-ए-ज़ब्त-ए-ग़म
तेरी नवाज़िशों से मुझे हौसला मिला
तेरा करम है तेरी इनायत है ऐ जुनूँ
मैं जिस को ढूँढ़ता था मुझी में छुपा मिला
'क़ादिर' बहुत निहाल है अपनी शिकस्त पर
बाज़ी लगाई दिल की तो उस का मज़ा मिला
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बे-कार भी इस दौर में बे-कार नहीं है
दीवाना है वो कौन जो हुश्यार नहीं है
दीवाना है वो कौन जो हुश्यार नहीं है
इस दौर-ए-तरक़्क़ी पे बहुत नाज़ न कीजे
इस दौर में सब कुछ है मगर प्यार नहीं है
हर चीज़ की बोहतात है इस दौर में लेकिन
वो चीज़ जिसे कहते हैं किरदार नहीं है
इस बात पे नाराज़ हैं ना-ख़ुश हैं खिंचे हैं
वो बात कि जिस बात का इज़हार नहीं है
ये बात है कुछ और कि दिल ज़ख़्मी है उस का
सूरत से तो 'क़ादिर' तिरा बीमार नहीं है
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बदली हुई नज़रों से अब भी अंदाज़ पुराने माँगे है
दिल मेरा कितना मूरख है वो बीते ज़माने माँगे है
दिल मेरा कितना मूरख है वो बीते ज़माने माँगे है
मुद्दत हुई दिल ताराज हुए मुद्दत हुई रिश्तों को टूटे
दुनिया है कि ज़ालिम आज भी वो रंगीन फ़साने माँगे है
दिल है कि वो है मुरझाया सा हर आस का चेहरा है उतरा
हर दोस्त मिरा फिर भी मुझ से ख़ुशियों के ख़ज़ाने माँगे है
हालात ने आँसू बख़्शे हैं तक़दीर में रोना लिखा है
और वक़्त न जाने क्यूँ मुझ से होंटों पे तराने माँगे है
अक़्ल और ख़िरद दोनों मुझ को देती हैं दुआएँ जीने की
एहसास मिरा मुझ से लेकिन मरने के बहाने माँगे है
बस्ती कैसी महफ़िल कैसी कैसे कूचे कैसे बाज़ार
दुनिया से जहाँ छुप कर रो ले दिल ऐसे ठिकाने माँगे है
हर चाह का बदला चाहत हो हर प्यार का प्यारा हो अंजाम
कुछ सोच ज़रा तू दुनिया से क्या चीज़ दिवाने माँगे है
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