उस के हिसार-ए-ख़्वाब को मत कर्ब-ए-ज़ात कर
इस ख़ुशबू-ए-ख़याल को तू काएनात कर
इस ख़ुशबू-ए-ख़याल को तू काएनात कर
दिल कब तलक जुदाई की शा
में मनाएगा
मेरी तरफ़ कभी तो नसीम-ए-हयात कर
मैं इक तवील रास्ते पर हूँ खड़ी हुई
या हब्स-ए-तीरगी ले या हाथों में हाथ कर
धी
में सुरों में छेड़ के फिर साज़-ए-ज़िंदगी
तू मेरे लहजे में भी कभी मुझ से बात कर
वो हिजरतें हों, हिज्र हो या क़िस्सा-ए-विसाल
आ फिर से मेरे नाम सभी वाक़िआ''त कर
पैरों से उस के नाम के रस्ते लिपट गए
अब तो यक़ीं के शहर में 'नाहीद' रात कर
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अभी से ताक़-ए-तलब पर न तू सजा मुझ को
अभी तो करना है इस दिल से मशवरा मुझ को
अभी तो करना है इस दिल से मशवरा मुझ को
अभी शबीह मुकम्मल नहीं हुई तेरी
अभी तो भरना है इक रंग-ए-मावरा मुझ को
कोई न कोई तो सूरत निकल ही आएगी
ज़रा बताओ तो दरपेश मरहला मुझ को
ये बात बात पे तकरार-ओ-बहस क्या करना
कि जीतना है तुम्हें और हारना मुझ को
मैं उस की ज़ात में शामिल थी, उस को मिल जाती
दुआ-ए-ख़ैर समझ कर वो माँगता मुझ को
मैं जिस में देख के ख़ुद को सँवार लूँ 'नाहीद'
अभी मिला ही कहाँ है वो आइना मुझ को
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आँख से ग़म निहाँ नहीं होते
फिर भी आँसू रवाँ नहीं होते
फिर भी आँसू रवाँ नहीं होते
उम्र भर का है तेरा मेरा साथ
इस क़दर बद-गुमाँ नहीं होते
हम-कलाम उन से हैं तसव्वुर में
अस्ल में ये समाँ नहीं होते
यूँ तो कहने को हम नहीं मौजूद
पर ये सोचो कहाँ नहीं होते
प्यार होता है या नहीं होता
इस में वहम-ओ-गुमाँ नहीं होते
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भरी रात में जागना पड़ गया है
तिरे बारे में सोचना पड़ गया है
तिरे बारे में सोचना पड़ गया है
किसी ख़्वाब की फिर से दस्तक है शायद
दर-ए-दिल मुझे खोलना पड़ गया है
तिरी सोच भी सोचनी पड़ गई है
तिरा लहजा भी बोलना पड़ गया है
धुआँ बन के साँसों में चुभने लगी थी
ख़मोशी को अब तोड़ना पड़ गया है
जहाँ रेज़ा रेज़ा मैं बिखरी पड़ी थी
वो मंज़र मुझे जोड़ना पड़ गया है
ये क्या सरसराहट हुई मेरे दिल में
क़लम रोक कर सोचना पड़ गया है
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जो तू मेरा मुक़द्दर बनते बनते रह गया है
समझ ले, कुछ कहीं पर बनते बनते रह गया है
समझ ले, कुछ कहीं पर बनते बनते रह गया है
ये दिल के ज़ख़्म तो वैसे के वैसे ही हरे हैं
कि तेरा लम्स मंतर बनते बनते रह गया है
मैं तेरी दूरी-ओ-क़ुर्बत से आगे आ गई हूँ
सो तेरा नक़्श दिल पर बनते बनते रह गया है
अजब ही क्या है जो मुझ को नहीं तू मिल सका तो
मिरा हर काम अक्सर बनते बनते रह गया है
कहानी इब्तिदा ही से बहुत उलझी हुई थी
सभी कुछ इस में बेहतर बनते बनते रह गया है
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तेरी राह में रख कर अपनी शाम की आहट
दम-ब-ख़ुद सी बैठी है मेरे बाम की आहट
दम-ब-ख़ुद सी बैठी है मेरे बाम की आहट
हाथ की लकीरों से किस तरह निकालूँ मैं
तेरी याद के मौसम, तेरे नाम की आहट
जब ये दिल रिफ़ाक़त की कच्ची नींद से जागा
हर तरफ़ सुनाई दी इख़्तिताम की आहट
रात के उतरते ही दिल की सूनी गलियों में
जाग उठती है फिर से तेरे नाम की आहट
बैठ जाती है आ कर दर पे क्यूँ मिरे, 'नाहीद'
तेरे साथ की ख़ुश्बू, तेरे गाम की आहट
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अज़ाब-ए-हिज्र से अंजान थोड़ी होता है
ये दिल अब इतना भी नादान थोड़ी होता है
ये दिल अब इतना भी नादान थोड़ी होता है
ये ज़िंदगी है बहुत कुछ यहाँ पे मुमकिन है
कि कुछ न होने का इम्कान थोड़ी होता है
ये दिल के ज़ख़्म छुपा कर जो मुस्कुराते हैं
तो मेरे दोस्त ये आसान थोड़ी होता है
कभी-कभार तो बिदअत भी हो ही जाती है
हर एक लम्हा तिरा ध्यान थोड़ी होता है
वो जिस के पास मोहब्बत भी हो, वफ़ा भी हो
भला वो बे-सर-ओ-सामान थोड़ी होता है
तिरी वफ़ा में कमी कुछ तो आई है कि ये दिल
बिला-जवाज़ परेशान थोड़ी होता है
इधर उधर से दलीलें उठानी पड़ जाएँ
जो इतना कच्चा हो, ईमान थोड़ी होता है
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अब कहाँ उस की ज़रूरत है हमें
अब अकेले-पन की आदत है हमें
अब अकेले-पन की आदत है हमें
देखिए जा कर कहाँ रुकते हैं अब
तेरी क़ुर्बत से तो हिजरत है हमें
साँस लेती एक ख़ुश्बू है जिसे
विर्द करने की इजाज़त है हमें
दिल-जज़ीरे पर है उस की रौशनी
इक सितारे से मोहब्बत है हमें
अब ज़रा सरगोशियों में बात हो
मेहरबाँ लहजे की आदत है हमें
फिर उसी चौखट की दिल को है तड़प
फिर उसी दर पर सुकूनत है हमें
हम तहय्युर खोल देंगे आँख से
कि मुयस्सर तेरी क़ुर्बत है हमें
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