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मुझे अच्छा बनाना चाहता है
ये क्या मुझ से ज़माना चाहता है
ये क्या मुझ से ज़माना चाहता है
लहू देकर जिसे ज़िंदा किया था
वही मुझ को मिटाना चाहता है
जिसे हम ने सिखाई थी सियासत
वही हम को हराना चाहता है
ढहा कर वो मेरे कच्चे मकाँ को
अब अपना घर बसाना चाहता है
उसी से हो रही है इस में धक धक
जिसे ये दिल भुलाना चाहता है
भरोसा ही नहीं मुझ पे तभी तो
वो मुझ को आज़माना चाहता है
मोहब्बत तक नहीं आती है जिस को
वो मुझ पे हक़ जताना चाहता है
इधर हम कर चुके हैं दिल को पत्थर
उधर वो दिल में आना चाहता है
ये क्या ज़िद है बता 'हस्साम' आख़िर
तू क्यूँ ख़ुद को रुलाना चाहता है
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पुरानी इक कहानी लिख रहा हूँ
कहाँ गुज़री जवानी लिख रहा हूँ
कहाँ गुज़री जवानी लिख रहा हूँ
मेरे अश'आर में कुछ भी न मेरा
मैं बस उस की निशानी लिख रहा हूँ
बहुत गंदे चलन उस के हैं फिर भी
मैं उस को ख़ानदानी लिख रहा हूँ
हुआ क्या है मुझे कोई बताए
मैं क्यूँ पानी से पानी लिख रहा हूँ
वो जिस के इश्क़ ने शाइ'र बनाया
उसी की मेहरबानी लिख रहा हूँ
मेरी तक़दीर में शायद नहीं है
मैं जिस को दिल की रानी लिख रहा हूँ
मोहब्बत कर के देखा है तभी तो
मोहब्बत को मैं फ़ानी लिख रहा हूँ
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जो है मेरे दिल में छुपाना नहीं है
मगर साफ़ तुम को बताना नहीं है
मगर साफ़ तुम को बताना नहीं है
मुझे अलविदा कहने आए ही क्यूँ हो
गले से मुझे जब लगाना नहीं है
हमारा पता जान कर क्या करोगे
तुम्हें लौट कर अब जब आना नहीं है
मुझे बेचकर ग़म कमानी है दौलत
मेरे पास कोई ख़ज़ाना नहीं है
लगाओ न उम्मीद मुझ से ज़ियादा
मेरा कोई ख़ुद का ठिकाना नहीं है
पड़े रहने दो मुझ को उजड़े चमन में
मुझे अपने घर को बसाना नहीं है
ख़ता दिल ने की है तो दिल अपना भुगते
हमें फेफड़ों को जलाना नहीं है
गले लग के क्यूँ रो रहे हो मुसलसल
जो 'हस्साम' को कुछ बताना नहीं है
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उतरी उतरी अपनी सूरत देखोगे
जिस दिन हम जैसों की हिम्मत देखोगे
जिस दिन हम जैसों की हिम्मत देखोगे
मेरे लिए खोदोगे कुएँ तो गिरोगे ख़ुद
और उसी दिन मेरी क़िस्मत देखोगे
गर पहली उम्मीद ख़ुदा से होगी तो
वक़्त-ए-आफ़त रब की क़ुदरत देखोगे
जब सीखोगे लोगों की इज़्ज़त करना
तब लोगों में अपनी इज़्ज़त देखोगे
जिस दिन ख़ालिक़ देगा तुम को इक बेटी
उस दिन से फिर घर में बरकत देखोगे
वक़्त मैं ऐसा लाऊँगा तुम मेरे लिए
दुश्मन के भी दिल में मोहब्बत देखोगे
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दरिया भी नहीं थे तिरे साहिल भी नहीं थे
हम कश्ती डुबाने में तो शामिल भी नहीं थे
हम कश्ती डुबाने में तो शामिल भी नहीं थे
वो लोग जो सालों से सज़ा काट रहे हैं
वो क़ातिलों की भीड़ में शामिल भी नहीं थे
हम जिन की मुहब्बत में भुला बैठे हैं ख़ुद को
वो कहते हैं हम प्यार के क़ाबिल भी नहीं थे
जो शख़्स मिरे दिल से निकाले नहीं निकला
उस शख़्स के हम दिल में तो दाख़िल भी नहीं थे
ता'बीर की ख़्वाहिश में भटकते रहे लेकिन
रस्ता भी नहीं थे तेरी मंज़िल भी नहीं थे
वो लोग जिन्हें अपना समझते रहे अब तक
वो लोग भरोसे के तो क़ाबिल भी नहीं थे
तुम जिन के बिछड़ जाने पे सद
में में गए हो
'हस्साम' तुम्हें लोग वो हासिल भी नहीं थे
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