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फ़लक पे चाँद नहीं कोई अब्र-पारा नहीं
ये कैसी रात है जिस में कोई सितारा नहीं
ये कैसी रात है जिस में कोई सितारा नहीं
ये इंकिशाफ़ सितारों से भर गया दामन
किसी ने इतना कहा जब कि वो हमारा नहीं
ज़मीं भँवर हो जहाँ आसमाँ समुंदर हो
वहाँ सफ़र किसी साहिल का इस्तिआरा नहीं
मैं मुख़्तलिफ़ हूँ ज़माने से इस लिए शायद
किसी ख़याल की गर्दिश मुझे गवारा नहीं
ख़िज़ाँ के मौसम-ए-ख़ामोश ने सदा दी है
जमाल-ए-दोस्त ने फिर भी मुझे पुकारा नहीं
जो रेज़ा रेज़ा नहीं दिल उसे नहीं कहते
कहें न आईना उस को जो पारा-पारा नहीं
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म सही फिर भी मुस्कुराया हूँ
'ज़फ़र' ब-नाम-ज़फ़र हार के भी हारा नहीं
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सियाह रात की हर दिलकशी को भूल गए
दिए जला के हमीं रौशनी को भूल गए
दिए जला के हमीं रौशनी को भूल गए
किसी कली के तबस्सुम ने बेकली दी है
कली हँसी तो हम अपनी हँसी को भूल गए
जहाँ में और रह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ी क्या है
फ़रेब-ख़ुर्दा तिरी बे-रुख़ी को भूल गए
यही है शेवा-ए-अहल-ए-वफ़ा ज़माने में
किसी को दिल से लगाया किसी को भूल गए
ज़रा सी बात पे दामन छुड़ा लिया हम से
तमाम उम्र की वाबस्तगी को भूल गए
ख़ुदा-परस्त ख़ुदा से तो लौ लगाते रहे
ख़ुदा की शान मगर आदमी को भूल गए
वो जिस के ग़म ने ग़म-ए-ज़िंदगी दिया है 'ज़फ़र'
उसी के ग़म में ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गए
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वो फूल जो मुस्कुरा रहा है
शायद मिरा दिल जला रहा है
शायद मिरा दिल जला रहा है
छुप कर कोई देखता है मुझ को
आँखों में मगर समा रहा है
मैं चाँद के साथ चल रहा हूँ
वो मेरी हँसी उड़ा रहा है
शायद किसी दौर में वफ़ा थी
ये दौर तो बे-वफ़ा रहा है
सौ रंग हैं ज़िंदगी के लेकिन
इंसान फ़रेब खा रहा है
तस्वीर बने तो मुझ से कैसे
हर नक़्श मुझे मिटा रहा है
जो लम्हा पयाम है फ़ना का
चुप-चाप क़रीब आ रहा है
तूफ़ाँ ने भी आँख खोल दी है
साहिल भी नज़र बचा रहा है
फ़नकार कहूँ उसे तो कैसे
तख़्लीक़ को जो मिटा रहा है
तक़दीर मिटा चुकी थी जिस को
तदबीर का राज़ पा रहा है
आवाज़ से आग लग रही है
मुतरिब है कि गीत गा रहा है
एहसास-ए-शिकस्त-ओ-कामरानी
आईने कई दिखा रहा है
वो ख़ाक-नशीं 'ज़फ़र' है यारो
जो सू-ए-फ़लक भी जा रहा है
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