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ये हुनर भी लिखने का मुझ में तो नहीं था पर
इश्क़ जो भी करते हैं शा'इरी ही करते हैं
इश्क़ जो भी करते हैं शा'इरी ही करते हैं
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मिरा अब नहीं लगता दिल तो कहीं भी
हक़ीक़त ये मैं हूँ भी और अब नहीं भी
हक़ीक़त ये मैं हूँ भी और अब नहीं भी
जी ऐसे रहा हूँ कि मेरा कोई नइँ
मैं घर पहले रहता था और अब कहीं भी
मिरे साथ ख़्वाबों की दुनिया है लेकिन
हक़ीक़त में इक ख़्वाब-दीदा नहीं भी
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ज़िन्दगी में रहे संग तीनों ही हम
मैं मिरी ये क़लम और मेरा ये ग़म
मैं मिरी ये क़लम और मेरा ये ग़म
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ख़ुशी और ग़म का तो आलम यही है
कि सिगरेट जलती है दोनों समाँ पर
कि सिगरेट जलती है दोनों समाँ पर
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