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हम को ख़ुशी की इस लिए चाहत नहीं हुई
हम को तो ग़म से ही कभी फ़ुर्सत नहीं हुई
हम को तो ग़म से ही कभी फ़ुर्सत नहीं हुई
कुछ भी कहो मगर ये त'अज्जुब की बात है
उस को किसी भी शख़्स की आदत नहीं हुई
इक बार ऐसा ज़ख़्म किसी ने मुझे दिया
फिर ज़िंदगी में कोई भी हसरत नहीं हुई
जाते हुए वो एक निशानी था दे गया
उस एक चीज़ की भी हिफ़ाज़त नहीं हुई
मिलने गए थे उस से मुझे झूठ बोल कर
तुम को ज़रा भी यार नदामत नहीं हुई
सारे ग़लत जो काम हैं हम ने किए मगर
जज़्बात की है हम से तिजारत नहीं हुई
काफ़ी दिनों से याद भी उस को नहीं किया
काफ़ी दिनों से कोई अज़िय्यत नहीं हुई
शायद थी ‘जॉन’ को भी मोहब्बत किसी से या
शायद ‘अभी’ को भी है मोहब्बत नहीं हुई
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