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तो फिर हम ना रहेंगे हम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
मेरे धुल जाएँ सारे ग़म अगर तुम मुझ को मिल जाओ
मेरे धुल जाएँ सारे ग़म अगर तुम मुझ को मिल जाओ
हर इक मौसम तुम्हारे बिन मुझे काँटे सा लगता है
गुलों से खिल उठें मौसम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
ज़माने भर के ज़ख़्मों को मैं पल भर में भुला दूँगा
ज़रूरी फिर नहीं मरहम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
मुझे डर है कि तुम को खो न दूँ इस भीड़ में इक दिन
बदल जाएगा ये आलम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
तुम्हारा और मेरा एक हो जाना हो जाएगा
इलाहाबाद का संगम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
उजाला चाँदनी का दिन में होगा और रातों में
खिलेगी धूप भी मद्धम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
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साथ तुम होते अगर तो बारिशों में भीगते
या'नी हम तुम मौसमों की साजिशों में भीगते
या'नी हम तुम मौसमों की साजिशों में भीगते
चाय का प्याला मैं होता चूमती जब तुम मुझे
सुब्ह तेरे होंठों की आराइशों में भीगते
जुस्तजू तेरी जो है वो ख़त्म हो जाती अगर
साथ मिल कर इश्क़ की हम ख्वाहिशों में भीगते
गर समझ लेते मुझे आसान होता ये सफ़र
यूँ न हम तन्हाइयों की बंदिशों में भीगते
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