अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा
ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब
तू मिरी बात के मफ़्हूम पे जाता है कहाँ
हिन्दी महक रही है लोबान जैसी मेरी
लहजे को मैं ने अपने उर्दू किया हुआ है
हम हैं हिन्दी और हमारा मुल्क है हिन्दोस्ताँ
हिन्द में पैदा तसव्वुफ़ के ज़बाँ-दाँ कीजिए
तारीकियों को आग लगे और दिया जले
ये रात बैन करती रहे और दिया जले
उस की ज़बाँ में इतना असर है कि निस्फ़ शब
वो रौशनी की बात करे और दिया जले
मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है
तेरे एहसास को ख़ुशबू बनाते
जो बस चलता तुझे उर्दू बनाते
यक़ीनन इस से तो बेहतर ही होती
वो इक दुनिया जो मैं और तू बनाते
मैं हिंदी और उर्दू को अलग कैसे करूँ यारों
अगर साँसें हटा दूँ तो बदन में कुछ नहीं बचता
नादानी ये ज़रा सी ले ले न जान मेरी
फूलों से भर रखी है मैंने मयान मेरी
हैं आपको जो शिकवे मेरी ज़बान से जाँ
तो काट लें लबों से अपने ज़बान मेरी
झूठी तारीफ़ों से सच्ची गाली अच्छी लगती है
मुझको तो उर्दू भी हिन्दी वाली अच्छी लगती है
एक मुद्दत की रियाज़त का सिला है 'साहिल'
मेरे अश'आर जो लोगों की ज़बाँ तक पहुँचे
जिस-जिसकी ज़बाँ बोल रही प्यार, मरेंगे
मैं लिखता हूँ ले जाओ, मेरे यार मरेंगे
मेरी तो मोहब्बत में फ़क़त हार हुई है
उस लड़की पे तुम देखना दो चार मरेंगे