@Armaank
Armaan khan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Armaan khan's shayari and don't forget to save your favorite ones.
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बाहर अक्सर शोर-शराबा रहता है
अंदर इक ख़ामोशी पलती रहती है
हम से इक अंदाज़ नहीं बदला जाता
दुनिया कैसे रंग बदलती रहती है
चलते रहना थकान जाएगी
और क्या होगा जान जाएगी
मैं यही सोचकर अकेला हूँ
वो किसी रोज़ मान जाएगी
सोचा नहीं कि क्यों मुझे नाकामियाँ मिलीं
जब अपने ही वजूद में सौ ख़ामियाँ मिलीं
तन्हाइयों से तंग था मैं पिछले कुछ दिनों
फिर एक दिन मुझे मेरी परछाइयाँ मिलीं
कुछ ख़्वाब कभी पूरे नहीं होने यहाँ पर
बोझिल हैं अगर पलकें तो सामान उतारो
तुम जैसों को चाहा था कभी मैंने ग़ज़ब है
आकर के किसी रोज़ ये एहसान उतारो
मैं इक ख़याल की दुनिया का शाहज़ादा हूँ
मेरे ख़याल की क्यारी का फूल थी तुम भी
मैं एक बार मोहब्बत में फिर शिकस्ता रहा
सो बेबसी में ये कहता हूँ भूल थी तुम भी
ये फ़ासला ज़रूर है मगर ये फ़ैसला नहीं
सो बेबसी में कह रहा हूँ मैं कोई गिला नहीं
मैं देर रात कमरे में ये सोचकर के आया हूँ
अब इसके बाद और कोई रास्ता बचा नहीं
यार सिगरेट जलाओ के बहुत दर्द है आज
सर्द सी रात है बारिश है हवा चल रही है
कोई पूछे कि ये सब क्या है तो कह देना उसे
बच तो निकले हैं मोहब्बत से दवा चल रही है
गाँव में छोड़ के आया था मोहब्बत अपनी
शहर में जिस्म था और गाँव में अटका दिल था
उसकी शादी बड़े लोगों में लगी और मैं ग़रीब
शहर से भाग के जाता भी तो क्या हासिल था
तन्ज़िया फ़िक्र का मैंने भी दिया उसको जवाब
वो है नादान समझता है कि बच्चा हूँ मैं
उसने हँसते हुए पूछा था कि कैसे हो तुम
मैंने भी हँसते हुए कह दिया अच्छा हूँ मैं
भंवर में गोते लगा रहे हो बताओ साहिल कहाँ है प्यारे
थकान क़दमों से पूछती है तुम्हारी मंज़िल कहाँ है प्यारे
मैं बेबसी के अब उस मुहाने पे आ खड़ा हूँ कि कोई कह दे
कि जिसको शिद्दत से चाहते हो तुम्हारे क़ाबिल कहाँ है प्यारे
तेरी क़िस्मत कहाँ-कहाँ, और मैं
एक वीरान सा मकाँ और मैं
दूर तक आ रहा नज़र कुछ तो
एक सिगरेट का धुआँ और मैं
हाँ यही मेरी ख़ुद-शनासी है
जिस्म ताज़ा है रूह बासी है
सब हँसी को हँसी समझते हैं
तुम तो समझो हँसी उदासी है
हमारी अपनी मर्ज़ी है हमारी अपनी दुनिया है
तुम्हारे रंग में ढल जाऊँगा सोचा ही क्यों तुमने
भटकती रूहों का बोझ कब तक कोई उठाता
कहीं ठहरता,पनाह लेता, तो साथ होता
मैं जिस अक़ीदत के साथ उसको भुला रहा हूँ
उसी अक़ीदत से चाह लेता, तो साथ होता
ऐ दिल-ए-हक़ शनास दुनिया है
न लगा इससे आस, दुनिया है
रूह को है तेरी ख़ुदा की तलब
और तेरे आस पास दुनिया है