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Kitab Shayari
कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए
Anjum Rehbar
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एक दिन मेरी ख़ामुशी ने मुझे
लफ़्ज़ की ओट से इशारा किया
Anjum Saleemi
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ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
Jaan Nisar Akhtar
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खेल पूरा सिफारिसों का था
बेवजह हम किताब में उलझे
Shiv तिवारी ✍️
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अश्क़-ओ-ख़ून घुलते हैं तब दीदा-ए-तर बनती है
दास्तान इश्क़ में मरने से अमर बनती है
Jaani Lakhnavi
16
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आड़ ले कर नए दौर के इल्म की
फ़ोन ने चिट्ठियों का गला घोंटा है
Intzar Akhtar
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आप कैसे भला समझ पाते
लफ़्ज़ सारे ज़रा अधूरे लिखे
Md Zishan Alam
14
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ख़ुदा के वास्ते मत लफ़्ज़-ए-ऐतबार तू बोल
ये लफ़्ज़ अच्छा नहीं लगता है लबों पे तेरे
Shajar Abbas
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इल्म नहीं है मुझ को मेरी चाहत का
तब ही लोग मुझे दीवाना नईं कहते
Devansh gupta
12
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न जाने इस क़दर तन्हा कोई कैसे जिया होगा
ग़ज़ब तन्हाई लिक्खी है हर इक ख़ामोश पन्ने पर
Ajeetendra Aazi Tamaam
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रहे जिस की ख़ुश्बू तमाम उम्र,तू तोहफ़तन वो गुलाब दे
नए रंग भर दिल-ओ-ज़ेहन में, मेरे यार मुझ को किताब दे
मैं शरीफ़-ओ-अहल-ए-जहाँ में 'अच्छों' की झूठी बातों से तंग हूँ
वो जो सामने मेरे सच कहे, मुझे दोस्त ऐसे ख़राब दे
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Nasreen Quamar
10
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अच्छी तरह से है मुझे दुनिया का इल्म, सो
क्या काम है जो आप यूँ अपना बना रहे
Prashant Sitapuri
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शहीदों ने लिखी ये दास्तान-ए-खूँ मुबारक हो
मैं हिंदुस्तान हूँ हर दिल में ज़िंदा हूँ मुबारक हो
Ajeetendra Aazi Tamaam
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प्रेम की गली में सब शराब ले कर आए थे
हम बहुत ख़राब थे किताब ले कर आए थे
Aman Akshar
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एक आवाज़ पे आ जाती है दौड़ी दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान नहीं देखती है
दोस्ती दोस्ती होती है तुम्हें इल्म नहीं
दोस्ती फ़ाइदा नुक़सान नहीं देखती है
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Aadil Rasheed
6
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क़ौम-ओ-मज़हब क्या किसी का और क्या है रंग-ओ-नस्ल
ऐसी बातें छोड़ कर बस इल्म-ओ-फ़न की बात हो
Sayan quraishi
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ये नदी वर्ना तो कब की पार थी
मेरे रस्ते में अना दीवार थी
आप को क्या इल्म है इस बात का
ज़िंदगी मुश्किल नहीं दुश्वार थी
थीं कमानें दुश्मनों के हाथ में
और मेरे हाथ में तलवार थी
जल गए इक रोज़ सूरज से चराग़
रौशनी को रौशनी दरकार थी
आज दुनिया के लबों पर मुहर है
कल तलक हाँ साहब-ए-गुफ़्तार थी
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ARahman Ansari
4
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उस के लबों को चूम के ये इल्म हो गया
मुझ को वो ज़हर के बिना भी मार सकती है
Harsh saxena
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क्यूँ बुरा भला कहें किसी को भी अगरचे हम
बन गए हैं हिज्र में जो साहिब-ए-किताब अब
Amaan Pathan
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हम ने अव्वल से पढ़ी है ये किताब आख़िर तक
हम से पूछे कोई होती है मोहब्बत कैसी
Altaf Hussain Hali
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