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हमारा इश्क़ है तफ़रीक़ ईं-ओ-आँ से बुलंद
ज़मीं-नशीं हैं मगर हैं हम आसमाँ से बुलंद
ज़मीं-नशीं हैं मगर हैं हम आसमाँ से बुलंद
बहार ख़ाक-ब-दामाँ है पस्तियों में अभी
चमन अगरचे उमीदों का है ख़िज़ाँ से बुलंद
हयात-ए-क़तरा है दरिया के साथ वाबस्ता
वो उड़ गया जो हुआ मौजा-ए-रवाँ से बुलंद
ख़िराम-गाह-ए-निगाराँ अगर नहीं न सही
मगर मैं दिल को समझता हूँ कहकशाँ से बुलंद
मज़ाक़-ए-इश्क़ नहीं पा-ए-बंद-ए-दैर-ओ-हरम
हमारा मस्लक-ए-दीं है हर आस्ताँ से बुलंद
'सलाम' हँसती हुई बिजलियों का तोड़ ये है
कि आशियाँ में रहो फ़िक्र-ए-आशियाँ से बुलंद
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न दिल में ग़म न होंटों पर हँसी है
ख़ुदावंदा ये कैसी ज़िंदगी है
ख़ुदावंदा ये कैसी ज़िंदगी है
तिरे वा'दे पे जीते हैं जिएँगे
मगर ये पैरहन भी काग़ज़ी है
उधर वो चाँद की धुन में मगन हैं
उधर अपनी ये बे-बाल-ओ-परी है
चमकती बिजलियाँ ही बिजलियाँ हैं
चमन में रौशनी ही रौशनी है
बसा-औक़ात ये होता है महसूस
कि नब्ज़-ए-ज़िंदगी रुक सी गई है
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दार-ओ-ज़िन्दाँ भी जाम-ओ-चंग भी है
ज़िंदगी बे-कराँ भी तंग भी है
ज़िंदगी बे-कराँ भी तंग भी है
अहल-ए-महफ़िल हों यूँ न अफ़्सुर्दा
दामन-ए-शब में कैफ़-ओ-रंग भी है
तुझे खोने का दिल को ग़म भी नहीं
तुझे पाने की इक उमंग भी है
कौन जाने कि मर्ग है सामाँ
बाइस-ए-हिफ़्ज़ नाम-ओ-नंग भी है
अल्लाह अल्लाह सियासत-ए-हाज़िर
सुल्ह के साथ साथ जंग भी है
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आरज़ूओं के धड़कते शहर जल कर रह गए
कैसे कैसे हश्र ख़ामोशी में ढल कर रह गए
कैसे कैसे हश्र ख़ामोशी में ढल कर रह गए
ख़ातिर-ए-ख़स्ता का अब कोई नहीं पुर्सान-ए-हाल
कितने दिलदारी के उनवान थे बदल कर रह गए
अब कहाँ अहद-ए-वफ़ा की पासदारी अब कहाँ
जो हक़ाएक़ थे वो अफ़्सानों में ढल कर रह गए
अब कहाँ वो साहिलों से सैर-ए-तूफ़ान-ए-हयात
अब तो वो साहिल तलातुम में बदल कर रह गए
हासिल-ए-ग़म या ग़म-ए-हासिल मुयस्सर कुछ नहीं
ज़िंदगानी के सभी अस्बाब जल कर रह गए
हाए वो ग़म जो बयाँ की हद में आ सकते न थे
क़ैद-ए-अश्क-ओ-आह से आगे निकल कर रह गए
अल-अमाँ हालात की महशर-ख़िरामी अल-अमाँ
डगमगाए इस क़दर गोया सँभल कर रह गए
रह गया हूँ एक मैं तन्हा हुजूम-ए-बर्क़ में
हम-नवा सारे चमन के साथ जल कर रह गए
बन तो सकते थे वो तूफ़ान-ए-क़यामत-ख़ेज़ भी
जो धड़कते वलवले अश्कों में ढल कर रह गए
एक वो हैं डालते हैं माह-ओ-अंजुम पर कमंद
और इक हम हैं कि ख़्वाबों से बहल कर रह गए
जिन को हासिल था ज़माने में सुकून-ए-इज़्तिराब
अपने ही एहसास के शो'लों में जल कर रह गए
जिन की ख़ामोशी थी मशहूर-ए-ज़माना ऐ 'सलाम'
आज उन के मुँह से भी शिकवे निकल कर रह गए
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जलता रहा वो उम्र-भर अपनी ही आग में
तेरे लबों की आँच न थी जिस के भाग में
तेरे लबों की आँच न थी जिस के भाग में
छोटी सी बात थी मगर इक रोग बन गई
राहत मिलाप ही में रही है न त्याग में
कैसे कहूँ उसे ये दुल्हन है बहार की
फूलों का ख़ूँ महकता है जिस के सुहाग में
वो हुस्न बन के गुल की तपिश में समा गया
हँस हँस के जल गया जो तिरे ग़म की आग में
कहने को मेरा साज़ है लेकिन किसे ख़बर
किस किस की धुन समाई है एक एक राग में
इक दाग़ बन के दिल में सुलगता है ऐ 'सलाम'
वो फूल जिस का लम्स नहीं अपने भाग में
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हम से रुख़्सार वो लब भूल गए
ज़िंदगी करने का ढब भूल गए
ज़िंदगी करने का ढब भूल गए
रात-दिन महव रहा करते थे
जाने क्या थी वो तलब भूल गए
आ गया सर पे ढलता सूरज
रात के शोर-ओ-शग़ब भूल गए
रंज-ए-महरूमी-ए-दिल याद रहा
रौनक़-ए-बज़्म-ए-तरब भूल गए
नक़्श-ए-दीवार बने बैठे हैं
याद इतना है कि सब भूल गए
ज़िंदगी बिगड़ी तो ऐसी बिगड़ी
जो भी थे रंज-ओ-तअब भूल गए
दिल में क्या क्या न थे अरमान 'सलाम'
शुक्र सद शुक्र कि सब भूल गए
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