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तिरा शहर मेरे सफ़र का भी हक़दार है
मिरा इश्क़ तेरी वफ़ा का तलबगार है
मिरा इश्क़ तेरी वफ़ा का तलबगार है
तिरे बा'द ये घाव मेरे भरे ही नहीं
अकेला मेरे मर्ज़ का तू गुनहगार है
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उस दौर का कह दूँ अगर तो फिर इबादत है मुझे
अपनी ज़बाँ में गर कहूँ तुम से मोहब्बत है मुझे
अपनी ज़बाँ में गर कहूँ तुम से मोहब्बत है मुझे
ये इश्क़ हो या ज़हर हो या दर्द हो या हो दवा
हर चीज़ की अब तो लगी नादान आदत है मुझे
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मेरा अब आने का भी दिल नहीं करता
कि दस्तक क़ब्र पर क़ातिल नहीं करता
कि दस्तक क़ब्र पर क़ातिल नहीं करता
वो मेरे साथ ग़म तो बाँट लेता है
वो अपने ग़म मगर शामिल नहीं करता
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