अब हमें इस सफ़र से निकलना हैं
कुछ दिनों बा'द घर से निकलना हैं
हैं नदामत इलाही , रहम बरसा
इस ख़ुदा-ए-कहरस निकलना हैं
चूम लूँ हाथ बे- ख़ौफ़ उस के बस
ऐ वबा तेरे डर से निकलना हैं
रात के ख़्वाब जो याद देती हैं
बस मुझे उस सहरस निकलना हैं
याद कूचा -ए- जाँ पाँव को आए
अब मुझे इस शहर से निकलना हैं
तू हैं 'दीदार' , वो मुंतज़िर फिर भी ?
बद-अहद इस नजर से निकलना हैं
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