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Powerful Justice Shayari
हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
Sahir Ludhianvi
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कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
Parveen Shakir
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इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा
Nida Fazli
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सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे
Nawaz Deobandi
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झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया
Waseem Barelvi
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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मेरे साथ मेरे तमाम दोस्तों को भी ब्लॉक कर दिया
सच बताओ इतनी नफरत है या मेरी मोहब्बत का ख़ौफ़
Piyush
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रोओ धोओ कोई बात नहीं
पर सच मुच में इतना दुख है क्या
Pawan
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बन जाती कैसे दुनिया से
सच कहने की आदत ठहरी
Pawan
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तुम मिरी ज़िंदगी हो ये सच है
ज़िंदगी का मगर भरोसा क्या
Bashir Badr
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सच बताओ कि सच यही है क्या
साँस लेना ही ज़िंदगी है क्या
कुछ नया काम कर नई लड़की
इश्क़ करना है बावली है क्या
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Vikram Gaur Vairagi
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अज़ीज़-तर मुझे रखता है वो रग-ए-जाँ से
ये बात सच है मेरा बाप कम नहीं माँ से
Tahir Shaheer
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कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ
ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ
सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ
मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ
ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ
सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ
उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ
नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ
चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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Kazim Rizvi
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तू तो सच में ही झूठा निकला यारा
तू तो कहता था हम मिलते रहेंगे
Vicky Kumar Rajak
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उस के वालिद नवाब हैं भाई
उस को हक़ है हमें भुलाने का
Deepak Sharma Deep
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वक़्त, वफ़ा, हक़, आँसू, शिकवे जाने क्या क्या माँग रहे थे
एक सहूलत के रिश्ते से हम ही ज़्यादा माँग रहे थे
उस की आँखें उस की बातें उस के लब वो चेहरा उस का
हम उस की हर एक अदास अपना हिस्सा माँग रहे थे
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Shikha Pachouly
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मुझे आज़ाद कर दो एक दिन सब सच बता कर
तुम्हारे और उस के दरमियाँ क्या चल रहा है
Tehzeeb Hafi
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तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ
Bakhtiyar Ziya
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हमें अपने घर से चले हुए सर-ए-राह उम्र गुज़र गई
कोई जुस्तुजू का सिला मिला न सफ़र का हक़ ही अदा हुआ
Iqbal Azeem
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अगर तौफ़ीक़ हो सच बोलने की
तो अपनी भी तरफ़-दारी न करना
Raees Rampuri
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Zulm Shayari
Revenge Shayari Collection
Self Respect Shayari
Politics Shayari