Sagar Sahab Badayuni

Sagar Sahab Badayuni

@sagar_sahab_badayuni00

Sagar Sahab Badayuni shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sagar Sahab Badayuni's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

17

Content

245

Likes

477

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

तुम लोग बस ऐसे उठा लेना जनाज़ा ये मिरा
जैसे किसी डोली में दुल्हन को उठाकर चलते हैं

Sagar Sahab Badayuni

इधर मिट्टी भी मेरी उठ नहीं पाई मिरे घर से
उधर हाथों में मेहँदी भी लगा ली शौक़ से उसने

Sagar Sahab Badayuni

दर-ब-दर किसी जानिब रोज़ चल रहा हूँ मैं
इक अज़ीब सूरत में ख़ुद ही ढल रहा हूँ मैं

कौन जल गया अंदर कौन मर गया मुझमें
किसकी मौत पर तन्हा रोज़ जल रहा हूँ मैं

इतना कहने पर भी जब बदली ही नहीं दुनिया
बे-वजह ही ख़ुद को फिर क्यों बदल रहा हूँ मैं

ख़ाक हो चुका है दिल चल रही मिरी साँसें
रफ़्ता रफ़्ता ही ख़ुद के दिन निगल रहा हूँ मैं

ज़िंदगी भला अब यह किस तरह बसर होगी
आज कल ग़मों से भी कब बहल रहा हूँ मैं

Sagar Sahab Badayuni

सबको बताता फिर रहा है अब मिरे किरदार को
ख़ुद के जिसे किरदार का अपने पता कुछ भी नहीं

Sagar Sahab Badayuni

किसके बुलाने पर चला आया यहाँ
है कौन वो जिसका नज़ारा कट गया

क्या एक टुकड़ा भी बचा सकता नहीं
क्या दिल मिरा पूरा ख़ुदारा कट गया

Sagar Sahab Badayuni

हर आख़िरी था जो सहारा कट गया
हमने जिसे दुख में पुकारा कट गया

हमको बुढ़ापा भी जवानी में मिला
बचपन कहीं जैसे हमारा कट गया

Sagar Sahab Badayuni

इक उम्मीद जला देती है अंदर से सब कुछ
आशिक़ ख़ुद को तो बर्बाद नहीं करता कोई

Sagar Sahab Badayuni

पहले पहल जब बात हुआ करती थी
घंटो लंबी रात हुआ करती थी

कोई बच्चा घर को नहीं जाता था
गाँव में जब बरसात हुआ करती थी

Sagar Sahab Badayuni

इस ख़ातिर भी इश्क़ मुहब्बत पर लिक्खा नइंँ मैं ने
मैं ने चाहा भी ये था बच्चों पर न असर जाए

Sagar Sahab Badayuni

शादी के आख़िर मौक़े पर जाकर बोली है वो
मुझको ले जा तेरी शहज़ादी न कहीं मर जाए

Sagar Sahab Badayuni

अब मेरा ख़ुद से ही झगड़ा चलता रहता है
अब मेरा ख़ुद के घर आना-जाना नइंँ होता

Sagar Sahab Badayuni

साथ विरासत की ख़ुशियाँ रहती मेरे वरना
शा'इर को रोने का यार बहाना नइंँ होता

Sagar Sahab Badayuni

दर्द ग़म परेशानी कुछ नहीं मुहब्बत में
काश वक़्त पर मेरा इख़्तियार कर लेतीं

आज ये मिरी वहशत भी मिरी ब-दौलत है
मौत पर ज़रा हमको याद यार कर लेतीं

Sagar Sahab Badayuni

जिस्म है फिर रहा उसे लेकर
आग ख़ुद को लगा नहीं सकते

Sagar Sahab Badayuni

ख़ाक ज़िंदा दिली रही अपनी
एक औरत हँसा नहीं सकते

Sagar Sahab Badayuni

देख लेगी कहीं मिरा चेहरा
आँख में ग़म दिखा नहीं सकते

Sagar Sahab Badayuni

ख़ाक ही ख़ाक है बची मुझमें
ख़ाक का घर बना नहीं सकते

Sagar Sahab Badayuni

मिरे ग़म का कभी नइंँ बन सका हमदर्द कोई भी
मिरी ही मौत को वो अब मिरा मरहम बताता है

Sagar Sahab Badayuni

कभी महफ़िल कभी मुझको मिरा हमदम बताता है
वही जो देख कर चेहरा सभी का ग़म बताता है

Sagar Sahab Badayuni

सबको घुट कर मरने का तोहफ़ा हम देंगे
रक्खा ही नइँ इक भी महफ़ूज़ शजर हमने

Sagar Sahab Badayuni

LOAD MORE