वो जिसकी याद ने जीना मुहाल कर रखा है
उसी की आस ने मुझको सँभाल कर रखा है
सियाह रातों में साए से बातें करता है
तुम्हारे ग़म ने नया रोग पाल कर रखा है
यूँ ही थोड़ी मेरी गज़लों में इतना दुख होता है
इस दुनिया ने हम लड़कों से रोने का हक़ छीना है
फ़ुर्सत नहीं मुझे कि करूँ इश्क़ फिर से अब
माज़ी की चोटों से अभी उभरा नहीं हूँ मैं
डर है कहीं ये ऐब उसे रुस्वा कर न दे
सो ग़म में भी शराब को छूता नहीं हूँ मैं
फूल से लेकर ये धनिया लाने तक के इस सफ़र को
मुझको तेरे साथ ही तय करने की ख़्वाहिश है पगली
हम चाह कर भी टूटते हैं हर दफ़ा
होता यही है इश्क़ का क्या क़ायदा
हर वक़्त तुम यूँ याद आते हो मुझे
जैसे नई दुल्हन करे मिस मायका
ज़ख़्म दिल के भरे नहीं अब तक
और इक दर्द फिर हरा कर लूँ
अब भरोसा नहीं किसी का पर
तू कहे तो यक़ीं तिरा कर लूँ