कभी साहिल कभी दरिया कभी मझधार से खेलो
भरोसा बाज़ुओं पर है तो फिर पतवार से खेलो
तक़ाज़ा आशिक़ी का हो तो सर क्या दिल झुका देना
मगर ग़ैरत पे आँच आए तो फिर तलवार से खेलो
ये सच है राज़िक़-ए-कुल एक बस अल्लाह है लेकिन
बिना मेहनत मशक्कत के किसी को कुछ नहीं देता
चलो तन्हाइयों को आज फिर आबाद करते हैं
किसी भूली हुई हस्ती को दिल से याद करते हैं
बुरी आदत है मुझको भूलने की इसलिए ऐ दोस्त
जिसे है भूलना अक्सर उसी को याद करते हैं