कितना भी दर्द पिला दे ख़ुदा पी सकता हूंँ
ज़िन्दगी हिज्र से भर दे मिरी जी सकता हूंँ
हर दफ़ा दिल पे ही खा के हुई है आदत ये
बंद आंँखों से भी हर ज़ख़्म को सी सकता हूंँ
जमातो में नमाजो़ में कभी नहीं मिलेगा
मिलेगा फ़ैज़ मयकदे में गर कहीं मिलेगा
तू ढूंँढ़ना अगर जो चाहे तो तलाश करले
मगर मुझ ऐसा बादाकश कहीं नहीं मिलेगा
फरिश्तों ने भी मेरी क़ब्र को कुछ ऐसे ढूंँढा
इधर अज़ाब सख़्त है सो वो यहीं मिलेगा
लिपट रहे हैं साक़ी से ये जानते हुए भी
कि तेरा कुर्ब सा सुकूंँ इधर नहीं मिलेगा
मैं मांँगने लगा तुझे जो फूट के दुआ में
कहा खुदा ने ख़ूब रो ले पर नहीं मिलेगा
ख़्वाहिशों का जनाज़ा उठा रक्खा है
तेरा ग़म अब भी दिल से लगा रक्खा है
ख़ुद से भी ख़ुद को ठुकराया है प्यार में
ख़ुद को भी ख़ुद का दुश्मन बना रक्खा है
जो ये कहता था मोहब्बत के बिना कुछ भी नहीं
उसकी नज़रों में मोहब्बत सा दिखा कुछ भी नहीं
जिसकी खा़तिर मैं ख़ुशी से हुआ इतना बर्बाद
वो समझता है के मुझ से तो नफा़ कुछ भी नहीं
ले गई मुझ से चुरा के मुझे वो साथ अपने
उसकी यादों के सिवा मुझमें रहा कुछ भी नहीं
दिल से चीख़ूँ के ज़बाँ से भला क्या फ़ायदा हो
उसके नज़दीक मोहब्बत की सदा कुछ भी नहीं
उसके आने से ही उठती थी बहारों में महेक
बिना उसके तो मिरी बाद-ए-सबा कुछ भी नहीं
जिसके होने से मयस्सर था मुझे सारा जहांँ
वो गई क्या के मिरे पास बचा कुछ भी नहीं
एक पल के लिए वो रुक भी अगर जाए तो
ज़िन्दगी फिर मिरी इक पल के सिवा कुछ भी नहीं
जो करे है तो तड़पता फिरे है हिज्र में बस
सच कहें 'फ़ैज़' मोहब्बत में रखा कुछ भी नहीं
जाने कब से बरस रहा हूंँ मैं
इक नज़र को तरस रहा हूंँ मैं
ज़िन्दगी सहरा हो गई है मिरी
मौत को जो तरस रहा हूंँ मैं
जफ़ाएँ जितनी मोहब्बत में कर गई हो तुम
वफ़ा की सारी हदों से गुज़र गई हो तुम
संँभाल के रखा था दिल में तुमको अपने पर अब
के मर गया है मिरा दिल सो मर गई हो तुम
बिछड़ के तुम से मिरी जाँ उजड़ गए हैं हम
बिछड़ के हम से मिरी जाँ निखर गई हो तुम
कहा था तुम ने मोहब्बत है कोई खेल नहीं
अब इसको खेल समझकर मुकर गई हो तुम
गुज़र गया तिरी खा़तिर मैं पुल सिरात से भी
न जाने छोड़ के मुझ को किधर गई हो तुम
गले से लग के मिरे सामने किसी और को
जिगर में मेरे हरे ज़ख़्म भर गई हो तुम
कहूँ तुझे लिखूँ तुझे पढ़ूँ तुझे
इक अक्स बनके सामने सुनूँ तुझे
रहेगी तू हमेशा दिल के पास ही
मै चाहे कितना भी गलत लिखूँ तुझे
तू पूछे जब कि तुझसे क्या है राब्ता
तो मैं, तू प्यार है मिरा कहूँ तुझे
ख़ुदा की मुझपे नेमतों को गर गिनूँ
तो सबसे आला दर्जे पे गिनूँ तुझे
मै आया वैसे तो हूँ दिल को बेचने
मगर ये दिल की शर्त है बिकूँ तुझे
मिरे दरूँ तू घुल मिले कुछ इस तरह
हर इक मै अपनी साँस में ज्यूँ तुझे
मै बन सकूँ तिरी निगाहों की तलब
जहाँ भी देखे हर तरफ दिखूँ तुझे
ज़रा शराब लाके दे दो मेरे ख़ून के लिए
कि आग चाहिए मुझे मिरे जुनून के लिए
है हाल अब वो मुफ़लिसी का मेरे घर के आज ओ कल
मै खून कर रहा हूं ख़ुद का ख़ुद के ख़ून के लिए
मिलेगा वो ही जो लिखा है मांगो य ना मांगो तुम
दुआ तो है तुम्हारे दिल के बस सुकून के लिए
जहान की सभी खुशियों को इख्ट्टा करके फिर
के क़ैद कर लिया है मैंने माह-ए-जून के लिए
ऐ हाक़िम-ए-शहर हैरान मत हो ये बता मुझे
दवा है तेरे पास मुझ जिसे ज़ुबून के लिए
नहीं है वो किसी भी मुक़ाबिल-ए-मकाम को
जुनून-ए-इश्क जिसको कम रहा जुनून के लिए
तिरा वो जोड़ा तेरे होने का भरम दिलाता है
वो जो मै लाया था तिरे मिरे शुगून के लिए
गुजरती है यूँ रोज़ ज़िन्दगी बेचैनियों में कि
सुकून से मै सोचूंगा कभी सुकून के लिए
तुम उसके हाल-ए-दिल पे गौर ठीक से दिया करो
के फ़ैज़ दर्द को बड़ाता है सुकून के लिए