कैसी वहशत मेरे अंदर आ गई
जब अचानक वो बराबर आ गई
झूठ उसको और ख़ुद को ये कहा
जिंदगी में उससे बेहतर आ गई
ख़ामुशी कुछ पल थी अपने दर्मियाँ
फिर हया की एक चादर आ गई
ख़ूब समझा मैं भी शाइर की ज़बाँ
शाइरी जब मेरे ऊपर आ गई
हैं तरक़्क़ी के ये सारे मोजिज़े
आप कहती नस्ल तू पर आ गई
जिंदगी तुझ से मुलाक़ात पे रो देते हैं
फिर तेरे ही दिए हालात पे रो देते हैं
ख़ुद सितम ढा के वो ये रोज़ कहा करते थे
आप तो छोटी सी हर बात पे रो देते हैं
ये ज़रूरी नहीं के बस ख़ुशी का मंज़र हो
है कई लोग, जो बरसात पे रो देते हैं
भूख पानी से मिटा कर, भी न पूरी हो तो
बाप फिर बच्चों की हाजात पे रो देते हैं
देर तन्हाई के बाद ओस की बूँदे 'आदिल'
देख लगता है के दिन रात पे रो देते हैं
हिंद की दहलीज़ पर पैदा हुई उर्दू ज़बाँ
है ज़बानें और भी पर इश्क़ की उर्दू ज़बाँ
कुछ अदब का, कुछ हुनर का, कुछ सुकूँ का ज़ाइक़ा
लब पे आए तो लगे है चाशनी उर्दू ज़बाँ
थाल में हमको मिले रिश्तों के शिकवे और गिले
ज़ाइक़े में इश्क़ का ही बस निवाला रह गया
अच्छे दिन की ज़बान दे दे हम
काहे झूठा बयान दे दे हम
चीख़ते क्यों हो सारे चुप है तो
काट कर क्या ये कान दे दे हम
सारे अंधे ही देख पाते है
या'नी आँखों को दान दे दे हम
झूठ को पाँव दे दिए तुमने
सच की सारी थकान दे दे हम
तुम तो बस देखते है मछली को
कैसे तुमको कमान दे दे हम