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हिंद की दहलीज़ पर पैदा हुई उर्दू ज़बाँ
है ज़बानें और भी पर इश्क़ की उर्दू ज़बाँ
है ज़बानें और भी पर इश्क़ की उर्दू ज़बाँ
कुछ अदब का, कुछ हुनर का, कुछ सुकूँ का ज़ाइक़ा
लब पे आए तो लगे है चाशनी उर्दू ज़बाँ
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रंग बदले जा रही है चाय अब
पत्तियाँ घुलने लगी है इश्क़ की
पत्तियाँ घुलने लगी है इश्क़ की
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थाल में हम को मिले रिश्तों के शिकवे और गिले
ज़ाइक़े में इश्क़ का ही बस निवाला रह गया
ज़ाइक़े में इश्क़ का ही बस निवाला रह गया
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