Ashkrit Tiwari

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    इमारतों का दुख तुम्हें नहीं दिखा है अब तलक
    छू कर सतह को तुमने महज़ धूल ही हटाई है

    Ashkrit Tiwari
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    उसे अपना कहा बस आजमाइश ही नहीं माँगी
    ख़ुदा माँगा तो पर उसकी नवाज़िश ही नहीं माँगी

    महीने भर से प्यासा छटपटाता मर गया था मैं
    वो बादल आए तो थे मैंने बारिश ही नहीं माँगी

    Ashkrit Tiwari
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    एक दिन हम कर्ण भी बन जाएँ लेकिन
    मित्र कह कर कोई दुर्योधन पुकारे

    Ashkrit Tiwari
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    एक ऐसी जंग होती है दिमाग-ओ-दिल मे मेरे
    कोई अच्छा भी लगे तो कहने भर से डरता हूँ मैं

    Ashkrit Tiwari
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    देख यूँ ही अब बदलता रहता है सब
    काश सब कुछ माँ के जैसा एक सा हो

    Ashkrit Tiwari
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    है वक़्त का कोई तक़ाज़ा या जुनूँ बाक़ी मेरा
    मैं लिख रहा हूँ जिस्म पर जब तक है ख़ूँ बाक़ी मेरा

    Ashkrit Tiwari
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    वो थी ग़ज़ल सो ध्यान से लोगों ने सब सुना
    मैं नुक़्ता था जो ठीक पढ़ा भी नहीं गया

    Ashkrit Tiwari
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    कहाँ खुद पे फिर मेरा क़ाबू चलेगा
    वो आवाज सुनली तो जादू चलेगा

    Ashkrit Tiwari
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    ज़ख़्म के आलम पे ही पर्दा रखा है
    आँच पर पलता हुआ सपना रखा है

    उठ चली है अजनबी हर्फ़-ए-तमन्ना
    ज़ेहन और दिल उसने ही महका रखा है

    दूर देखा था जिसे नज़दीक है वो
    शहर ने गाँवों को यूँ अपना रखा है

    वो अजल की शाम मौला नाम तेरे
    ये अजल के नाम वो चेहरा रखा है

    तुम भी अन्वेषी हो उन ज़ुल्फ़ों के कैदी
    जिन अजब तस्वीरों से रिश्ता रखा है

    Ashkrit Tiwari
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    उसे बस थोड़ी सी फ़ुर्सत रही होती
    मेरे दिल को भी कुछ हसरत रही होती

    किसी का साथ देना चाहा पल भर का
    उसे तो एक से क़ुर्बत रही होती

    किसी से वादा जो करना, निभाना भी
    मेरे हुजरे यही कुदरत रही होती

    मुसाफ़िर छू गया उसको बिना डर के
    ख़ुदाया मुझ पे ये बरकत रही होती

    अभी भी बोल सकती है वो अन्वेषी
    बुलाने भर की तो हिम्मत रही होती

    Ashkrit Tiwari
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