इमारतों का दुख तुम्हें नहीं दिखा है अब तलक
छू कर सतह को तुमने महज़ धूल ही हटाई है
उसे अपना कहा बस आजमाइश ही नहीं माँगी
ख़ुदा माँगा तो पर उसकी नवाज़िश ही नहीं माँगी
महीने भर से प्यासा छटपटाता मर गया था मैं
वो बादल आए तो थे मैंने बारिश ही नहीं माँगी
एक ऐसी जंग होती है दिमाग-ओ-दिल मे मेरे
कोई अच्छा भी लगे तो कहने भर से डरता हूँ मैं
है वक़्त का कोई तक़ाज़ा या जुनूँ बाक़ी मेरा
मैं लिख रहा हूँ जिस्म पर जब तक है ख़ूँ बाक़ी मेरा
ज़ख़्म के आलम पे ही पर्दा रखा है
आँच पर पलता हुआ सपना रखा है
उठ चली है अजनबी हर्फ़-ए-तमन्ना
ज़ेहन और दिल उसने ही महका रखा है
दूर देखा था जिसे नज़दीक है वो
शहर ने गाँवों को यूँ अपना रखा है
वो अजल की शाम मौला नाम तेरे
ये अजल के नाम वो चेहरा रखा है
तुम भी अन्वेषी हो उन ज़ुल्फ़ों के कैदी
जिन अजब तस्वीरों से रिश्ता रखा है
उसे बस थोड़ी सी फ़ुर्सत रही होती
मेरे दिल को भी कुछ हसरत रही होती
किसी का साथ देना चाहा पल भर का
उसे तो एक से क़ुर्बत रही होती
किसी से वादा जो करना, निभाना भी
मेरे हुजरे यही कुदरत रही होती
मुसाफ़िर छू गया उसको बिना डर के
ख़ुदाया मुझ पे ये बरकत रही होती
अभी भी बोल सकती है वो अन्वेषी
बुलाने भर की तो हिम्मत रही होती