हम ही तुम से बड़ी उम्मीद लगा बैठे थे
बे-वजह ख़्वाब सुनहरे से बना बैठे थे
आग अक्सर उसी घर को भी जला देती है
रौशन-ए-दर को जो दीपक सा जला बैठे थे
शाम होते ही लटक जाती गुलों की लाशें
पेड़ जो इश्क़-बग़ीचे में लगा बैठे थे
हो गई एक ख़ता तन्हा बहुत हम रोए
जाने-अनजाने में हर ख़त को जला बैठे थे
शहर है जो ये बहानों का बना लगता है
और हम ख़ुद को ही वादों पे लुटा बैठे थे
मैं गिरह खोल उठा दिल की सभी गाँठों की
दरमियाँ जो भी थे वो रम्ज़ बता बैठे थे
कितना आसाँ हो जाए तुमसे बातें कहना
ज़बाँ सा आँखों को मिल जाए कोई इक गहना
शोर मयस्सर जिनको उनको क्या इल्म-ओ-हालात
कितना मुश्किल होता है तन्हा घर में रहना
सर्द हवाएँ पूछ रही ग़ुर्बत के अफ़्साने
गीली लकड़ी ठण्डा चूल्हा आँसू का बहना
ले के क़िस्मत मैं आया हूँ माटी की अपनी
जिस दीवार के साये में हूँ उसको है ढहना
सितारों से उलझता जा रहा हूँ
ख़यालों में भटकता जा रहा हूँ
तिरी आँखों का जादू बोलता है
मैं ख़ुद में ही सिमटता जा रहा हूँ
तअल्लुक़ का भरम टूटा है लेकिन
अभी तक सर पटकता जा रहा हूँ
गुज़रता वक़्त कुछ कहता नहीं है
मगर मैं सब समझता जा रहा हूँ
तिरी तंज़ीम में जलवा भी देखा
मगर फिर भी लुटाता जा रहा हूँ
तिरी हर बात में दुनिया नई थी
मैं हर लफ़्ज़ों को पढ़ता जा रहा हूँ
ग़म-ए-दुनिया से मैं वाक़िफ़ बहुत हूँ
मगर तुझ से उलझता जा रहा हूँ
तिरे पहलू में जन्नत भी नहीं थी
मगर फिर भी ठहरता जा रहा हूँ
मिरी बर्बादियों पर ख़ुश बहुत तू
मैं फिर भी मुस्कुराता जा रहा हूँ
तिरे लहजे में शोख़ी भी बहुत थी
मगर मैं दिल दुखाता जा रहा हूँ
मिरे अफ़्क़ार का मौसम है बदला
मैं बादल सा बरसता जा रहा हूँ
मुझे हर ज़ुल्म की आदत पड़ी है
तिरी दुनिया में रहता जा रहा हूँ
तआरुफ़ था कभी मैं भी बहारों
मगर बन ख़ाक उड़ता जा रहा हूँ
तिरी महफ़िल में बेगाना सा हूँ मैं
तिरे सज्दे से उठता जा रहा हूँ
मुझे हर मोड़ पर ठोकर मिली है
मगर मंज़िल भी पाता जा रहा हूँ
तिरी रहमत का ख़्वाबीदा था हरदम
मगर अब जागता सा जा रहा हूँ
तिरी ज़ुल्फ़ों में उलझे दिन गुज़ारे
मगर अब फिर सुलझता जा रहा हूँ
मैं वो बर्बादियों की दास्ताँ हूँ
जिसे हर वक़्त पढ़ता जा रहा हूँ
अजल के क़हक़हे गूँजे फ़ज़ा में
मैं आख़िर तक भी ज़िंदा जा रहा हूँ
फिर से मिलने को ये सौदा ही करें
वादा तो हो भले आधा ही करें
तुम हमें देख के पलटो न कभी
हम तुम्हें देख के रोया ही करें
इश्क़ में दर्द का चर्चा न हुआ
दिल के हालात इशारा ही करें
ख़्वाब महफ़ूज़ हैं आँखों में अभी
इनको ताबीर का सौदा ही करें
अब न पहलू में कोई बैठ सके
अपनी तन्हाई को अपना ही करें
अब तो रिश्तों का भरम भी न रहे
जो भी सच हो वही देखा ही करें
दिल में उलझी हुई गिरहें खोलें
या मोहब्बत को अधूरा ही करें
राह तकते हैं सदा रातों में
चाँद को अपना सहारा ही करें
आज फिर से कोई अफ़वाह उड़ी
चलो हम उस पे भरोसा ही करें
दुश्मनी की भी शराफ़त देखो
ग़म दिए और कहा हँसना ही करें
ख़त जो भेजा था मोहब्बत में कभी
फिर वही बात तमाशा ही करें
मौत की आहट सुनाई दे रही है
क्यूँ मोहब्बत सी दिखाई दे रही है
वो जिसे मैंने था रोका मोड़ पर यूँ
शक्ल मेरी सी दिखाई दे रही है
साहिलों ने हँस के बोला ये तलातुम
दर्द को मेरे रिहाई दे रही है
इस तरह रुख़्सार पर चंदन घिसे हैं
चीख़ रूहों की सुनाई दे रही है
रौशनी के उन फ़रिश्तों की कहानी
तीरगी जिनको दिखाई दे रही है
बाप ने जिन पे जवानी ख़र्च कर दी
वो ही औलादें रुलाई दे रही है
ये सफ़ेदी सर पे मेरे ताज सी है
उम्र ढलती अब दिखाई दे रही है
तन उधेड़ी खाल की ढोलक बना था
उनकी शादी में सुनाई दे रही है
सवाल-ए-इश्क़ में ख़ुद को भुला रहा हूँ मैं
तुम्हारे दर्द को अपना बना गया हूँ मैं
तुम्हारी राह में सब कुछ लुटा चुका लेकिन
अब अपने हौसले को आज़मा रहा हूँ मैं
कभी जो ख़्वाब थे आँखों से मिट गए ऐसे
के जैसे रेत पे तस्वीर खींचता हूँ मैं
हज़ार तीर हैं सीने में आरज़ू बनकर
फिर एक तीर तुम्हारा भी चाहता हूँ मैं
तुम्हारी चाह में सब कुछ गँवा चुका हूँ मगर
तुम्हारी बात पे फिर भी ठहर गया हूँ मैं
'सफ़ीर' नाम मेरा है मगर कहानी ये
कि ख़ुद ही ख़ुद को भी फिर अब भुला रहा हूँ मैं
ज़मीं ने फिर से तेरे ख़्वाब को जगाया है
सबा ने ग़ुंचों से हर राज़ को छुपाया है
यक़ीं में डूबे हैं दिल के तमाम अफ़साने
गुमाँ ने फिर भी तसव्वुर को क्या सुनाया है
शबों के लम्हे जो ज़हराब-ए-फ़िक्र बन बैठे
सितम को अश्क ने सीने में यूँ बसाया है
रहे रक़ीब तो माज़ी को भूलना चाहा
नज़र ने याद का एक-एक क़र्ज़ खाया है
गुलों का दर्द तो शायद हवा समझ लेती
मगर हिसाब वफ़ा आँख ने निभाया है
शबाब-ए-ज़िन्दगी मौजा-ए-ख़ार बन निकली
जिसे न देखना था वक़्त ने दिखाया है
रियाज़-ए-दिल का सुकूँ ग़म-ज़दा ही पाया है
तुझे भुलाने में हर तर्ज़ आज़माया है
वो आरज़ू में तेरी इक गली का शाइर था
सवाल तेरी वफ़ा ने उसे बनाया है
रगड़ रगड़ के जो एड़ियों को अक़ीदे चक्कर लगा रहे हो
अजीब दुंबे हो ख़्वाह मख़ाह में बुला रही क्यों ही जा रहे हो
मज़ाक़ जानिब तुम्हारे करके वो हर सखी को बता रही है
ये देखो जाहिल गॅंवार आशिक़ है अपनी तफ़री करा रहे हो
ज़रा सी ग़ैरत की फाॅंक फाॅंको अमाॅं मियाॅं तुम ये बात समझो
बनो हो सैयाँ छबीले जानी यूँ अपने कुनबे सता रहे हो
रक़ीब हम को बता के तुमने बड़ी फ़ज़ीहत उड़ाई बेटा
न जाने कितनों का शोना बाबू जिसे तुम अपना बता रहे हो
हमारी मानो ये काम कर लो कि लेखपाली प्रपत्र भर लो
बनाओ ताज़ीर अपनी ज़ाहिद यूँ अपने सजदे गिना रहे हो
नसीब का ये हिसाब देखो ज़बाॅं से आगे ख़िलाफ़ निकले
जो चाँद चुम्बन में ढूँढते थे उसी को राहें दिखा रहे हो
बहार आई थी बाग़ में जब तो तुमने काँटे चुने थे जानिब
जो फूल मुरझा के गिर चुका है उसी को मज़हब बना रहे हो
ये इश्क़ दुनिया ये नामुरादी हमारी बातों पे ग़ौर कर लो
बचाओ रूहों का ताज तर्ज़ा ये फ़र्ज़ अपने भुला रहे हो
दुश्मनी से वो हमें फिर यूँ सज़ा देने लगे
दोस्त बनकर वो हमें ज़ख्म-ए-वफ़ा देने लगे
इश्क़ करने का सिला कुछ इस तरह हमको मिला
लोग क़ातिल बनके फिर दिल की दवा देने लगे
जुर्म हमसे ये हुआ जो सच था उसको सच कहा
अब अदावत में हमें अपने सज़ा देने लगे
मेरे ज़ेर-ओ-बम पे जो बनते थे रश्क-ए-हूर वो
वो ही देखो अब हमें ज़हर-ए-वबा देने लगे
शहर के चौराहे पर चुपचाप बस हम थे खड़े
और जो मासूम थे सब बद-दुआ देने लगे
हर घड़ी झूठे बयानों के चले जो सिलसिले
जो वफ़ा के ख़ान-ए-ख़ानाँ वो खता देने लगे
सरपरस्ती में था जिनके घर मेरा ये फूस का
वो ही आँधी बनके शोलों को हवा देने लगे
मेरे इश्क़-ए-नूर के जो थे मज़म्मत दार सब
मेरी हालत देख कर वो भी दुआ देने लगे
रात घर याद तुम मैं और बस
दिन दुआ दर्द सब हैं और बस
मेज़ तस्वीर फ़न ग़ज़ल पर
चैन रोना दुखी नैं और बस
दूर जाना यूँ जान के फिर
झूठ होना तिरा बैं और बस
आँख आँसू लहू ये बिस्तर
चाह चाहत सभी वैं और बस
मय सिफाले 'सफ़ीर' साक़ी
हम यूँ बर्बाद से हैं और बस