कभी तो कोसते होंगे सफ़र को
कभी जब याद करते होंगे घर को
निकल पड़ती हैं औलादें कमाने
परिंदे खोल ही लेते हैं पर को
ग़ज़ल पूरी न हो चाहे, मग़र इतनी सी ख़्वाहिश है
मुझे इक शेर कहना है तेरे रुख़्सार की ख़ातिर
`तू मेरे पास आ कर बैठ मुझसे बात कर ऐ दोस्त
ये मुमकिन है कोई दरिया ख़राबों से निकल आये
एक नया आशिक़ है उसका, जान छिड़कता है उसपर
मुझको डर है वो भी इक दिन मयखाने से निकलेगा
जबकि मैंने इश्क़ में मरने का वादा कर लिया
तब लगा मुझको कि मैंने इश्क़ ज़्यादा कर लिया