वही दिल है कि हर इक बात पे आवाज़ करता था
वही दिल है किसी भी बात पे अब खन नहीं करता
वही चेहरा है मैं अक्सर कि जिस की क़स्में खाता था
वही चेहरा है पर अब देखने का मन नहीं करता
हाँ मेरे साथ कई नफ़्सियाती मसअले हैं
तमाम ज़हनी मसाइल से जूझता हूँ मैं
ये ज़ह्न मेरा न मुझ को कहीं निगल बैठे
मुझे बचाओ रफ़ीक़ो कि डूबता हूँ मैं
कोई तो है जो मन ही मन मुझे आवाज़ देता है
मैं जब भी बाँधता हूँ फंदा रस्सी टूट जाती है
सुनता है भला कौन यहाँ दर्द किसी का
मैं ख़ुश था चलो मेरी परेशानी को पूछा
उस वक़्त इन आँखों में मिरी पानी भर आया
जब शह्र में मुझ से किसी ने पानी को पूछा
न जाने कब भला मुझ पे गिरेगी बर्क़ आकर
न जाने कब भला छूटूँगा इस ज़िंदान से मैं
न जाने कब भला टूटेगी सर पे कोई आफ़त
न जाने कब भला जाऊँगा आख़िर जान से मैं