इश्क़ पहले बना था जाने जाँ
नींद की गोलियाँ बनीं थीं फिर
नींद की गोलियाँ बनीं थीं फिर
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उसे अपना बनाना चाहता था
यही सारा ज़माना चाहता था
यही सारा ज़माना चाहता था
अब इक तस्वीर बनकर रह गया हूँ
हमेशा मुस्कुराना चाहता था
बस इक ज़रिया थी मेरी ख़ुद-कुशी जाँ
मैं उस का दिल दुखाना चाहता था
क़ज़ा से डर नहीं लगता है लेकिन
ज़रा बस शायराना चाहता था
जो लड़का रह गया मुनकिर ही होकर
ख़ुदा तुम को बनाना चाहता था
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दर्द में आ रहा मज़ा साहब
तुम ने ऐसा है क्या किया साहब
तुम ने ऐसा है क्या किया साहब
ख़िज़्र की उम्र भी अता कर दी
फिर तेरा हिज्र भी दिया साहब
अब नहीं बोलते मेरे हक़ में
बन गए तुम भी अब ख़ुदा साहब
हाथ छूटे नहीं कभी अपने
उम्र भर हम रहे जुदा साहब
मुझ को छोड़ा मेरी ख़ुशी के लिए
ग़म इसी बात का रहा साहब
मुझ को अब आप बस दुआ दीजे
काम आई न कुछ दवा साहब
उस की ग़लती थी इश्क़ कर बैठा
वरना था आदमी भला साहब
ख़ुशनसीबी है तुम से इश्क़ हुआ
और ये ही मेरी सज़ा साहब
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दिल हुआ करता था पहले, अब कहाँ बाक़ी रहा
जल गए अरमान सारे, बस धुआँ बाक़ी रहा
जल गए अरमान सारे, बस धुआँ बाक़ी रहा
हम कहो क्या क्या बताएँ, क्या है खोया इश्क़ में
ये जहाँ बाक़ी रहा ना वो जहाँ बाक़ी रहा
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यार दिखावे का ग़म मेरा
मुझ को सच में खा जाएगा
मुझ को सच में खा जाएगा
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बस यही बात मुझ को खलती है
क्यूँ भला साँस मेरी चलती है
क्यूँ भला साँस मेरी चलती है
एक रस्ता है ख़ुद-कुशी अब तो
अब ये वहशत नहीं सँभलती है
हाए ये चाँद क्यूँ नहीं मरता
हाए ये धूप क्यूँ निकलती है
इश्क़ आता नहीं कभी तन्हा
इक उदासी भी साथ चलती है
मेरी बाहों में जो बहलती थी
किस की बाहों में अब मचलती है
पाँव में बाँध कर नई पायल
ख़ामुशी छत पे क्यूँ टहलती है
जुगनुओं तुम ही मुझ को बतलाओ
रात कपड़े कहाँ बदलती है
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