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    खेलना ही मत कभी शतरंज घर में
    चाल चलना पड़ता है अपनों के आगे

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    मुझको नया भरम दे नया साल दर पे है
    इक बे-वफ़ा सनम दे नया साल दर पे है

    अच्छी ग़ज़ल तराशे ज़माना हुआ है अब
    कोई नया ही ग़म दे नया साल दर पे है

    जितने मिले थे दर्द रक़म कर दिए सभी
    ग़म की नई क़लम दे नया साल दर पे है

    वो शेर सुनके वाह है करती ये रहम क्यों
    शाइर को बस सितम दे नया साल दर पे है

    वादा शराब छोड़ने का है दिया उसे
    यारा शराब कम दे नया साल दर पे है

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    कोई भी चीज़ रख कर दो मिनट में भूल जाता हूँ
    मगर इस ज़ेहन में जो याद है जाती नहीं है क्यों

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    दौर ऐसा आया है घर के बड़े अब
    माँगते हैं मौत पोते के ब-जाए

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    ख़बर आई है पीएचडी मुकम्मल हो गई लेकिन
    नफ़ा' क्या आजतक जो तुम मिरी आँखें न पढ़ पाई

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    बनाया छत कि बेटी आसमाँ देखे
    गई वो कूद सूरज के लिए पगली

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    तू कभी भी मिला ही नहीं था मुझे,
    छात्र हैं हम गणित के रखा मानकर

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    कभी क्या याद आता है कि कोई याद करता है
    भुला देंगे तरीक़े से कभी आए भुलाने पर

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    वक़्त क्यूँ है लगा पूछ मत
    बात ये है पहुँच हम गये

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    किसी दिन ढूँढने का मन करे तो बस वहीं आना
    सभी जाते कहां है ग़ौर करना ख़ुदकुशी करके

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