गुलशन मिले चुनने बहुत से ख़ार में
डूबा दिल-ए-नादाँ तिरे ही प्यार में
अपनी जवानी में कमाने आ गया
मिलता हूँ अपने गाँव से अख़बार में
ओछा तिरा लगने लगा रंग-ए-जहाँ
रंगों का कारोबार देखा यार में
पेड़ गिन काटी थी राहें
ख़र्च गिन कर कट रही है
अम्न की उम्मीद में हैं
और नफ़रत बट रही है