Neeraj Neer

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    अच्छी बुरी हर इक कमी के साथ हैं
    हम यार आँखों की नमी के साथ हैं

    दो जिस्म ब्याहे जा रहे हैं आज भी
    हम सब पराए आदमी के साथ हैं

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    जाँ हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं
    देखो शेर मुकम्मल अच्छा लगता है

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    मस'अला फिर वही बे-घर हुए लोगों का है
    हम सभी दिल से निकाले कहाँ तक जाएँगे

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    पेड़ को काटने वाले क्या जाने दुख
    हम गले लग नहीं सकते दीवार से

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    सर्द रात है हवा भी सोच मत पहन मुझे
    सुब्ह देख लेंगे किस कलर की शाल लेनी है

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    मेरे साथ हँसने वालों शरीक हों दुख में
    गर गुलाब की ख़्वाहिश है तो चूम काँटों को

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    कहाँ हम ग़ज़ल का हुनर जानते हैं
    मगर इस ज़बाँ का असर जानते हैं

    ये वो हुस्न जिसको निखारा गया है
    नया कुछ नहीं हम ख़बर जानते हैं

    कि है जो क़फ़स में वो पंछी रिहा हो
    परिंदें ज़मीं के शजर जानते हैं

    फ़क़त रूह के नाम है इश्क़ लेकिन
    बदन के हवाले से घर जानते हैं

    फ़ुलाँ है फ़ुलाँ का यक़ीं हैं हमें भी
    सुनो हम उसे सर-ब-सर जानते हैं

    कि अब यूँ सिखाओ न रस्म-ए-सियासत
    झुकाना कहाँ है ये सर जानते हैं

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    हैराँ मैं भी हूँ दोस्त यूँ बालों में गजरा देखकर
    ये फूल आख़िर कबसे फूलों को पहनने लग गया

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    बोलिए फिर क्या लगाऊँ होंठ से मैं
    लीजिए सिगरेट पीना बंद कल से

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    ठीक है मैं फेर लेता हूँ नज़र को
    तुम भी झुमके से कहो गर्दन न चूमे

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