मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते
दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते
इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना
इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते
कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में
तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते
बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या
और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते
धूप को साया ज़मीं को आसमाँ करती है माँ
हाथ रखकर मेरे सर पर सायबाँ करती है माँ
मेरी ख़्वाहिश और मेरी ज़िद उसके क़दमों पर निसार
हाँ की गुंज़ाइश न हो तो फिर भी हाँ करती है माँ
सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुरअत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है
ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है
बेटे से समझौता करना पड़ता है
जब औलादें नालायक हो जाती हैं
अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है
सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है
जब सारे के सारे ही बेपर्दा हों
ऐसे में खु़द पर्दा करना पड़ता है
प्यासों की बस्ती में शोले भड़का कर
फिर पानी को महंगा करना पड़ता है
हँस कर अपने चहरे की हर सिलवट पर
शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है
उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नम्बर आपका है