बड़ी हसरत हमारी थी मगर दिल हार कर बैठे
बचाया हद से ज़्यादा पर उसे हम प्यार कर बैठे
रहे ख़ामोश कुछ दिन तक मगर कहना ज़रूरी था
मिली इक रोज़ हमको और हम इज़हार कर बैठे
क्या हुआ कुछ बोलिए क्यों लग रहे बेज़ार से
छोड़िए गुस्सा सनम जी बोलिए अब प्यार से
मुनाफ़िक और मुशरिक में कहीं अफ़ज़ल नहीं कोई
यहांँ तो शहर हैं लेकिन इधर जंगल नहीं कोई
दिल चोरी का काम ग़लत है
'अफ़ज़ल' तेरा नाम ग़लत है
इश्क़, मोहब्बत तुम रहने दो
इसका तो अंजाम ग़लत है