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क़तरे भी गिरे आँख से पारा भी बहुत था
वो शख़्स मुझे जान से प्यारा भी बहुत था
वो शख़्स मुझे जान से प्यारा भी बहुत था
यूँ छोड़ के जाने की ज़रूरत तो नहीं थी
दिल तोड़ने को एक इशारा भी बहुत था
चुप-चाप ज़ुबांँ से मेरी शिकवा है तुम्हें क्यूँ
रो रो के निगाहों ने पुकारा भी बहुत था
पलकों पे सजाए थे कई मीठे से सपने
जो ख़्वाब गिरा आँख से ख़ारा भी बहुत था
उस को बिठा के साथ में इतना न उड़ो तुम
जो आज तुम्हारा है हमारा भी बहुत था
जो हो गया सो ठीक है ज़िद छ़ोड़ 'असद' अब
जाने दे उसे उस का ख़सारा भी बहुत था
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महकते इत्र के मानिंद है ये इश्क़ जाने मन
भले पर्दे में भी निकलोगी तो पहचान ही लेंगे
भले पर्दे में भी निकलोगी तो पहचान ही लेंगे
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सोचता है कि ज़ीस्त तर्क करे
क्या करे कर्ब-नाक दिल अपना
दिल लगाने को चाहिए इक दिल
कैसे लग जाए ख़ाक-दिल अपना
खा रही है मलूलियत हम को
हो गया है ख़ुराक-दिल अपना
वो भी सूरत ही देखती होगी
यूँ तो है ठीक ठाक दिल अपना
ख़ूब-रू जब पलट गई तौबा
हम ने थामा तपाक दिल अपना
यूँ तो रखता है ज़ौक़े-मर्ग असद
फिर भी सीता है चाक-दिल अपना
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