सिम्पल भोली भाली लड़की, हाए रे
दोस्त के जैसी प्यारी लड़की, हाए रे
एक शराबी बुत से माँगे व्हिस्की और
व्हिस्की पीने वाली लड़की, हाए रे
ये तो बिलकुल सपने जैसी बात हुई
जैसा सोचा वैसी लड़की, हाए रे
बात मुसलसल करता रहता हूँ उससे
मेरे यारों जैसी लड़की, हाए रे
पतली खम्बे जैसी लड़की से तौबा
लम्बी चौड़ी भारी लड़की, हाए रे
क़तरे भी गिरे आँख से पारा भी बहुत था
वो शख़्स मुझे जान से प्यारा भी बहुत था
यूँ छोड़ के जाने की ज़रूरत तो नहीं थी
दिल तोड़ने को एक इशारा भी बहुत था
चुपचाप ज़ुबांँ से मेरी शिकवा है तुम्हें क्यों
रो रो के निगाहों ने पुकारा भी बहुत था
पलकों पे सजाए थे कई मीठे से सपने
जो ख़्वाब गिरा आँख से ख़ारा भी बहुत था
उसको बिठा के साथ में इतना न उड़ो तुम
जो आज तुम्हारा है हमारा भी बहुत था
जो हो गया सो ठीक है ज़िद छ़ोड़ 'असद' अब
जाने दे उसे उसका ख़सारा भी बहुत था
किसी को ज़िंदगी देकर कभी भी मार देता है
कहानी कार भी कोई ख़ुदा से कम नहीं होता
महकते इत्र के मानिंद है ये इश्क़ जाने मन
भले पर्दे में भी निकलोगी तो पहचान ही लेंगे
इल्म-दाँ हो रिंद हो या बावरा क्या देखना
चारा-गर तू घाव भर किसका भरा क्या देखना
ज्ञान देते उन अमीरों से वो कासा बोल उठा
भूख में रोटी दिखा सोना ख़रा क्या देखना
ताज पर जब चाँदनी बरसे तो जन्नत सा लगे
बात यूँ तो ठीक है पर मक़बरा क्या देखना
अल्मिया हो सानेहा हो या कोई धोखाधड़ी
सर पटक कर एक दीवाना मरा क्या देखना
मशवरे फिर मशवरे फिर मशवरे लेते रहे
क्या बचा इसमें तुम्हारा मशवरा क्या देखना
मीरो-ग़ालिब के हवाले से हुई है शाइरी
लखनऊ दिल्ली है कहती आगरा क्या देखना
तीन रंगों को बराबर का दिया दर्जा 'असद'
कितना केसरिया है कितना है हरा क्या देखना
नज़रें हो गड़ीं जिनकी वसीयत पे दिनो-रात
माँ-बाप कि उम्रों कि दुआ खाक़ करेंगे
ज़माने से मिली शोहरत ज़माने तक ही सीमित है
हम अपना कद हमारे दोस्त से ऊँचा नहीं रखते
बा-वज़ू पुर-फ़िदाक दिल अपना
हम चले कर के पाक दिल अपना
सोचता है कि ज़ीस्त तर्क करे
क्या करे कर्ब-नाक दिल अपना
दिल लगाने को चाहिए इक दिल
कैसे लग जाए ख़ाक-दिल अपना
खा रही है मलूलियत हमको
हो गया है ख़ुराक-दिल अपना
वो भी सूरत ही देखती होगी
यूँ तो है ठीक ठाक दिल अपना
ख़ूब-रू जब पलट गई तौबा
हमने थामा तपाक दिल अपना
यूँ तो रखता है ज़ौक़े-मर्ग असद
फिर भी सीता है चाक-दिल अपना
ये कैसा लक़ब है कहाँ तू कहाँ मैं
बड़ा बे-सबब है, कहाँ तू कहाँ मैं
मैं गुमसुम तो हूँ दोस्त तुझसे बिछड़ कर
तुझे ये तरब है कहाँ तू कहाँ मैं
ये चीज़ें सिखाता नहीं शख़्स कोई
ये उनका नसब है कहाँ तू कहाँ मैं
ये पहले से तय था जहाँ मैं वहाँ तू
मगर हाल अब है कहाँ तू कहाँ मैं
यूँ छुप छुप के मिलना है बेकार कोशिश
ख़बर सब को सब है कहाँ तू कहाँ मैं
'असद' चाहे जितना तू कर ले बराबर
ये दुनिया का ढब है कहाँ तू कहाँ मैं
दो नावों पर पाँव पसारे ऐसे कैसे
वो भी प्यारा हम भी प्यारे ऐसे कैसे
सूरज बोला बिन मेरे दुनिया अंधी है
हँस कर बोले चाँद सितारे ऐसे कैसे
तेरे हिस्से की ख़ुशियों से बैर नहीं पर
मेरे हक़ में सिर्फ ख़सारे ऐसे कैसे
गालों पर बोसा दे कर जब चली गई वो
कहते रह गए होंठ बिचारे ऐसे कैसे
मुझ जैसों को यां पर देख के कहते हैं वो
इतना आगे बिना सहारे ऐसे कैसे
जैसे ही मक़्ते पर पहुँची ग़ज़ल असद की
बोल उठे सारे के सारे ऐसे कैसे