लग गई मुझको नज़र बेशक़ तुम्हारी आईनों
मैं बहुत ख़ुश था किसी इक सिलसिले से उन दिनों
सिवा इसके कुछ अच्छा ही नहीं लगता है शामों में
सफ़र कैसा भी हो घर को परिंदे लौट जाते हैं
सामने वो यूँ मिरे डब्बा टिफ़िन का रखती थी
जैसे थाली खाने की बीवी लगाकर देती है
वो अपने सर 'प घूंघट को सजाकर के है बैठी
कोई पण्डित है जो कुछ बड़बड़ाए जा रहा है
अपना क्या है हम तो साहब कुछ भी कहते बोलते हैं
लोग शातिर हैं बड़ा ही, जो समझके बोलते हैं
वस्ल में अंधा है कोई, हिज़्र में बाग़ी है कोई
सब्ज़ पत्ते बे - ज़बाँ हैं ख़ुश्क पत्ते बोलते हैं
जलवों के दम पर चलाती थी जिसे तू पागलों सा
नाम उसका चल रहा है और जलवे बोलते हैं
क्या कमी है साथ चलने वालों की तुझको यहां अब
तेरी इक आवाज़ पर ख़ामोश रस्ते बोलते हैं
कब तलक अटके रहोगे, कब लबों को चूमना है?
गाल चूमूँ तो मुझे ये उसके झुमके बोलते हैं
क्या तुम्हारा भी कभी झगड़ा हुआ है इनसे भाई ?
या हमारे सामने ही घर के शीशे बोलते हैं
पीर इक इक हर्फ़ की है जान 'आरुष को पता, और
लोग कहते हैं कि आरुष शे'र अच्छे बोलते हैं
फिर थोड़ी ही देर में ये बिस्तर मक़तल होना है
इससे पहले ही कातिल, तुझको ओझल होना है
जाओ कोई शिकवा नईं, अपनी अपनी मर्ज़ी है
तुझको आंसू होना है, मुझको काजल होना है
हूर कतारों में लगकर फिर कहती थी ये मुझसे
मुझको पागल होना है, मुझको पागल होना है
ख्वाब बुना करती थी बाप बनाने के मुझको जो
ग़ज़ब सितम है उसके बच्चों का अंकल होना है
हम गुल से भी टकराएं तो चोट आएगी 'लाजो
तेरी ख़ातिर तो पत्थर को भी मखमल होना है